रोहित वेमुला के आत्म हत्या के बाद, समाज में एक ‘नयी’ विचारधारा आई है! वामपंथियों और दलितों का सहयोग और एकता! जे एन यु प्रकरण में यह ‘प्रयोग’ दिखा! भाजपा की बेचैनी समझ में आती है!

वामपंथी शुरू से ही दलितों, अल्प संख्यकों के साथ हैं! पर हर बार देखा गया है, समर्थन में क्रन्तिकारी विचारधारा का ह्रास!
वाम यानि मजदुर वर्ग की पार्टी! पूंजीवाद को हटाकर समाजवाद लाने वाली पार्टी! निजी पूंजी पर आधारित उत्पादन का ध्वंस! रास्ता मजदुर वर्ग का अधिनायकत्व! वर्ग समाप्ति कर वर्ग विहीन समाज की स्थापना, किसी भी वर्ग का दुसरे वर्ग पर अधिनायकत्व की समाप्ति! मानव द्वारा मानव का शोषण ख़त्म!
स्वतंत्रता के बाद, खासकर स्टॅलिन के मृत्यु के बाद, भारत कम्युनिस्ट पार्टी ने संसदीय प्रजातंत्र को मजबूत करने का काम किया, चुनाव जितना मकसद बन गया! जो रास्ता था, वह लक्ष्य बन गया! धार्मिक, जाति शोषण का विरोध करते करते, उसका उपयोग चुनाव जितने में करने लगे! कोंग्रेस या कई भारी मौकापरस्त छेत्रिय दल भी प्यारे हो गए! अभी बंगाल का चुनाव उदहारण है!
जय भीम लाल सलाम आन्दोलन, आंबेडकर के उन मान्यताओं को लेकर चलता है, जो नारे के रूप में वाम के लिए भी प्रिय है! नेस्तनाबूद करने की बात करते हैं दलित नेता; जाति, धर्म और पूंजीवाद का! मायावती ने ज्यादा वक्त नहीं लिया वाम के ‘इस चाल’ को और व्यक्तव्य दिया, दलित आन्दोलन साम्यवाद के लिए नहीं हैं!
माना, वाम पंथियों के लक्ष्य मायावती या और कोई दलित नेता नहीं हैं, पर क्या दलित साम्यवादी क्रांति के लिए तैयार हैं?
आगे बढ़ने से पहले यह बताना आवश्यक होगा कि, दलितों का पूरी तरह से  सर्वहाराकरण हो चूका है! उनमे बहुत कम ही पूंजीपति या बहुत धनि हैं, पर उनके नेता बुर्जुआ वर्ग के चाकरी में व्यस्त हैं और एक बहुत ही सुविधा भरी जीवन जी रहे हैं! हाँ, दलित मजदूरों का सामाजिक और जातिय शोषण और प्रतारणा जारी है और पूंजीवाद के संकट में बढ़ता ही जा रहा है!
मजदुर वर्ग के नेत्रित्व में क्रांति! क्यूंकि वह समाज का सबसे अग्रणी वर्ग है और छमता है क्रांति करने का! वह समाज में भारी बहुमत में है, किसान स्वाभाविक रूप से उसके साथ में हैं! “मजदुर वर्ग के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, बल्कि जंजीर है!”
जय भीम लाल सलाम! यदि वाम दलितों के पास जाता है, क्यूंकि वह मजदुर हैं तो फिर बात अलग है, क्रांतिकारी कदम हो सकता है! पर दलितों के ‘विचारधारा’, जो आर्थिक मांग के साथ सामाजिक बराबरी की बात करता है, सत्ता में हिस्सा लेने की बात करता है और राजनितिक क्रांति को नजर अंदाज करता है, तो इतिहास गवाह है, वाम का ही छरण होगा!
अभी फासीवाद बढ़ रहा है! भारत में आर एस एस के नेत्रित्व में और दुनिया में बाकि जगहों में! फासीवाद का नंगा रूप युक्रेन, अमेरिका में दिख रहा है! आतंकवाद भी चरम है, जो पूंजीवादी साम्राज्यवाद का ही देन है!
ऐसे समय एक बृहद राष्ट्रिय संधि आवश्यक होगा! हर प्रगतिशील संगठन इसका हिस्सा हो सकता है! यह आन्दोलन एक महत्वपूर्ण सहयोग कर सकता है! आर एस एस का रवैया दलितों के प्रति जग जाहिर है!
फासीवाद, यानि पूंजीवाद का ही एक रूप, 2008 के बाद पूंजीपतियों के लिए आवश्यक हो गया! अमेरिका में बैंक घेरो, यूरोप के मजदूरों का भारी विरोध, अविकसित देशों और चीन में भी असर ने पूंजी के चाकरों और ‘विद्वानों’ को समझ में आया की अभी ‘प्रजातान्त्रिक’ तरीके सफल नहीं होंगे मजदुर वर्ग के विरोध को दबाने में! इसके पहले क्रांति आगे बढे, इसे तोड़ना होगा और धर्म, जाति, देश, व्यक्ति पूजा, आदि का भरपूर इस्तेमाल करना होगा! घटते मुनाफा और मुनाफा दर को बढ़ाना होगा!
आवश्यक है वाम नेत्रित्व को, की हर प्रगतिशील और क्रांतिकारी समूह को संगठित करें, मजदुर वर्ग के नेत्रित्व में  पूंजीवाद का विरोध करे और क्रांति की तैयारी  रखें, मौका कभी भी मिल सकता है! दलित पीड़ित हैं, पर सर्वहारा क्रांति से अलग लडाई केवल बुर्जुआ ‘सुधार’ का ही हिस्सा बन जायेगा और शोषण और गहन होगा!