dr neelam mahendra

समाज में घटित होने वाली घटनाएँ मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती हैं।भारतीय समाज में उसकी संस्कृति के प्रति खोते आकर्षण को पुनः स्थापित करने में अपना योगदान देना चाहती हूँ। साथ ही content writing एवं creative writing में भी रूचि रखती हूँ।
This user has not made any comments
    30

यह कैसी पढ़ाई है और ये कौन से छात्र हैं drneelammahendra.blogspot.in/2017/03/blog-post.html

submitted 2 months ago by in Politics
Start a discussion.
Article Details

यह कैसी पढ़ाई है और ये कौन से छात्र हैं

9 फरवरी 2016 में जेएनयू के बाद एक बार फिर 21 फरवरी 2017 को डीयू में होने वाली घटना  ने सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि क्यों हमारे छात्र संगठन राजनैतिक मोहरे बनकर रह गए हैं और इसीलिए आज एक दूसरे  के साथ नहीं एक दूसरे के खिलाफ हैं

इन छात्र संगठनों का यह संघर्ष छात्रों के लिए  है या फिर राजनीति के लिए?
इनकी यह लड़ाई शिक्षा नौकरी बेरोजगारी या फिर बेहतर भविष्य इनमें से किसके  लिए है ?
इनका विरोध किसके प्रति है भ्रष्टाचार भाईभतीजावाद या फिर गुंडागर्दी ?
इनका यह आंदोलन किसके हित में है उनके खुद के या फिर देश के?
अफसोस तो यह है कि छात्रों का संघर्ष  ऊपर लिखे गए किसी भी मुद्दे के लिए नहीं है।
सवाल कालेज प्रशासन से भी है कि उमर खालिद अतिथि वक्ता के तौर पर रामजस कालेज को उपयुक्त क्यों दिखाई दिया जो कि स्वयं एक छात्र है?
उनका आदिवासियों पर किया गया शोध अन्तराष्ट्रीय दर्जे का था या फिर अफजल और बुरहान वाणी जैसे आतंकवादियों से उनकी हमदर्दी  उनकी योग्यता बन गई?
और जब कुछ छात्रों के विरोध के फलस्वरूप ” विरोध की संस्कृति ” विषय पर आयोजित इस सेमीनार में वक्ता के तौर पर उनका आमंत्रण निरस्त किया जाता है तो वामपंथी छात्र संगठन द्वारा इस विरोध के विरोध में बस्तर और कश्मीर की आज़ादी के नारे क्यों लगाए जाते हैं?
यह कैसी पढ़ाई है और ये कौन से छात्र हैं?
 जब एबीवीपी इन नारों का विरोध करता है तो बात अभिव्यक्ति की आजादी और राष्ट्रवाद पर कैसे आ जाती है?
अभिव्यक्ति की यह कैसी आज़ादी है जिससे देश की अखंडता ही खतरे में पड जाए?
क्यों हमारे कालेज के कैम्पस पढ़ाई से ज्यादा राजनीति के अड्डे बन चुके हैं?
देश की राजधानी दिल्ली का रामजस कालेज,1917 में अपनी स्थापना के साथ इस वर्ष अपने 100 वर्ष पूर्ण कर रहा है।
दिल्ली यूनिवर्सिटी देश की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी है जिसमें एडमिशन मिलना ही अपने आप में एक उपलब्धि मानी जाती है। वहाँ पर हमारे छात्रों को वैचारिक और सांस्कृतिक खुलेपन के नाम पर क्या परोसा जा रहा है ?
बड़े ही भोलेपन से कुछ लोग यह सवाल कर रहे हैं कि इस सेमीनार में आमन्त्रित सदस्यों को सुनने से क्या हो जाता?
तो इसका जवाब इन वक्ताओं के अतीत में है। उमर खालिद का इतिहास तो पूरा देश जानता है। शहेला राशिद एक कश्मीरी होने के साथ ही एआईएसए की वाईस प्रसीडेंट हैं। जिस संगठन से वे जुड़ी हैं जाहिर है वे छात्रों के आगे उस विचारधारा को ही परोसतीं।
माया कृष्ण राव थ्रिएटर कलाकार हैं जो नाटक एवं अन्य कलाओं से छात्रों को विरोधके तरीके सिखातीं।
सृष्टि श्रीवास्तव जो कि पिंजरा तोड़ अभियान चलाती हैं  वो महिलाओं को पितृसत्तामक संस्कृति का विरोध करना बतातीं कि आखिर क्यों लड़कियों के लिए रात आठ बजे के बाद बाहर निकलना मना है लेकिन लड़कों के लिए नहीं। प्रद्युमन जयराम जो कि लन्दन में पीएचडी कर रहे हैं वो सोशल मीडिया पर विरोध के तरीके उसके फायदे और उससे होने वाले नुकसान के बारे में बताते। विक्रमादित्य सहाय ट्रान्सजोन्डर लोगों को समाज में  मिलने वाले विरोध का विरोध करते।
इन लोगों को सुन कर हमारे छात्रों का क्या भला हो जाता?
वैसे तो सेमीनार का विषय भी अपने आप में बहुत कुछ कहता कि किसी सकारात्मक विषय के बजाए विरोध जैसे विषय को बच्चों के आगे रखकर देश के वातावरण में नकारात्मकता नहीं फैलायी जा रही?
हमारे देश ने हाल ही में अनेक उपलब्धियाँ हासिल की हैं जैसे इसरो ने एक साथ 104 सैटेलाइट लाँच की थी या फिर 2016 के ऐतिहासिक पेरिस जलवायु समझौता अथवा भारत के योग को विश्व भर में जो मान्यता मिली है इसके अलावा भारत के युवाओं को उद्यमी कैसे बनाएँ जैसे अनेकों विषय वाद विवाद के लिए हो सकते थे लेकिन  कल्चरल स्टडीज़ के नाम पर अपनी सोच अपनी संस्कृति अपने पिंजरेसे बाहर निकलने के लिए प्रेरित करने के बहाने हमारे देश के युवाओं को एक विशेष संस्कृति का मीठा जहर बहुत ही चालाकी से परोसा जा रहा है। छात्र तो मोहरा भर हैं असली राजनीति तो वे समझ ही नहीं पा रहे। शायद इसीलिए 27 फरवरी को रामजस कालेज के प्रिंसिपल राजेन्द्र प्रसाद छात्रों के बीच खुद पर्चे बाँट रहे थे जिसमें उन्होंने साफ तौर पर लिखा कि देशभक्ति की हवा तले शिक्षा को खत्म न होने दें। वे सियासी औजार बनकर न रह जांए और उस राजनीति को स्वीकार न करें जो उनकी पढ़ाई के ही खिलाफ है। विरोध तर्कों का हो विचारों का हो लेकिन एक दूसरे का तो कतई न हो।
तो विरोध की संस्कृति सीखने से पहले विरोध की राजनीतिको समझना आवश्यक है और हम सभी के लिए यह भी समझना जरूरी है कि सुखद परिणाम और खुशहाली के रास्ते एक दूसरे से सहमति और समझौतों की संस्कृति से निकलते हैं न कि विरोध से।
और आजादी का मतलब बेलगाम होना कतई नहीं होता। दुनिया का हर आजाद देश अपने संविधान एवं अपने कानून व्यवस्था के बन्धन में ही सुरक्षित होता है। आजादी तो देश के हर नागरिक को हासिल है अगर आप आजाद हैं अपनी अभिव्यक्ति के लिए तो दूसरा भी आजाद है आपका प्रतिकार करने के लिए। वह भी कह सकता है कि आप उनके विरोध का विरोध करके उसकी आजादी में दखल दे रहे हैं।
तो फिर इसका अन्त कहाँ है?
इसलिए अधिकारों एवं आजादी की भी सीमाएं होती हैं। एक लक्ष्मण रेखा हर जगह आवश्यक है आजादी की भी सुरक्षा के लिए।
डॉ नीलम महेंद्र

 

 

 

    0

यह हैं असली नायिकाएँ drneelammahendra.blogspot.in/2017/01/blog-post_29.html

submitted 3 months ago by in Politics
Start a discussion.
Article Details

यह हैं असली नायिकाएँ

भंसाली का कहना है कि पद्मावती एक काल्पनिक पात्र है ।इतिहास की अगर बात की जाए तो  राजपूताना इतिहास में चित्तौड़ की  रानी पद्मिनी का नाम बहुत ही आदर और मान सम्मान के साथ लिया जाता है।
भारतीय इतिहास में कुछ औरतें आज भी वीरता और सतीत्व की मिसाल हैं जैसे सीता द्रौपदी संयोगिता और पद्मिनी। यह चारों नाम केवल हमारी जुबान पर नहीं आते बल्कि इनका नाम लेते ही जहन में इनका चरित्र कल्पना के साथ जीवंत हो उठते है। 
रानी पद्मिनी का नाम सुनते ही एक ऐसी खूबसूरत वीर राजपूताना नारी की तस्वीर दिल में उतर आती है जो चित्तौड़ की आन बान और शान के लिए 16000 राजपूत स्त्रियों के साथ  जौहर में कूद गई थीं। आज भी रानी पद्मिनी और जौहर दोनों एक दूसरे के पर्याय से लगते हैं। इतिहास गवाह है कि जब अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ के महल में प्रवेश किया था तो वो जीत कर भी हार चुका था क्योंकि एक तरफ रानी पद्मिनी को जीवित तो क्या मरने के बाद भी वो हाथ न लगा सका ।
लेकिन भंसाली तो रानी पद्मिनी नहीं पद्मावती पर फिल्म बना रहे हैं । बेशक उनके कहे अनुसार वो एक काल्पनिक पात्र हो सकता है लेकिन जिस काल खण्ड को वह अपनी फिल्म में दिखा रहे हैं वो कोई कल्पना नहीं है। जिस चित्तौड़ की वो बात कर रहे हैं वो आज भी इसी नाम से जाना जाता है। जिस राजा रतनसिंह की पत्नी के रूप में रानी पद्मावती की  ” काल्पनिक कहानी” वे दिखा रहे हैं वो राजा रतन सिंह कोई कल्पना नहीं हमारे इतिहास के वीर योद्धा हैं। और ‘लास्ट बट नौट द लीस्ट ‘ जो अलाउद्दीन खिलजी आपकी इस फिल्म में पद्मावती पर फिदा है उसके नाम भारतीय इतिहास का सबसे काला पन्ना और खुद मुग़ल इतिहास में सबसे क्रूर शासक के नाम से दर्ज है।
तो सोचने वाली बात यह है कि यह कैसी काल्पनिक कहानी है जिसका केवल ‘ एक ‘ ही पात्र काल्पनिक है ? कोई भी कहानी या तो कल्पना होती है या सत्य घटना पर आधारित होती है । भंसाली शायद भूल रहे हैं कि  यदि अतीत की किसी सत्य घटना में किसी कल्पना को जोड़ा जाता है तो इसी को  ‘तथ्यों को गलत तरीके से पेश करना ‘ या फिर ‘इतिहास से छेड़छाड़ करना ‘ कहा जाता है।
चलो मान लिया जाए कि रानी पद्मावती एक काल्पनिक पात्र है लेकिन भंसाली शायद यह भी भूल गए कि काल्पनिक होने के बावजूद रानी पद्मावति एक भारतीय  रानी थी जो किसी भी सूरत में स्वप्न में भी  किसी क्रूर मुस्लिम आक्रमण कारी पर मोहित हो ही नहीं सकती थी।
हमारे इतिहास की यह स्त्रियाँ ही हर भारतीय नारी की आइकान हैं । रानी पद्मिनी जैसी रानियाँ किसी पटकथा का पात्र नहीं असली नायिकाएँ हैं , वे किवदन्तियाँ नहीं हैं आज भी हर भारतीय नारी में जीवित हैं।
डॅा नीलम महेंद्र

 

    0

घी गेहूँ नहीं रोज़गार चाहिए साहब i.indiaopines.com/yunhidilse/%e0%a4%98%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%87%e0%a4%b9%e0%a5%82%e0%a4%81-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a5%9b%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf/

submitted 3 months ago by in Politics
Start a discussion.
Article Details

घी गेहूँ नहीं रोज़गार चाहिए साहब

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और चुनाव किसी भी लोकतंत्र का महापर्व होते हैं ऐसा कहा जाता है। पता नहीं यह गर्व का विषय है या फिर विश्लेषण का कि हमारे देश में इन महापर्वों का आयोजन लगा ही रहता है । कभी लोकसभा  कभी विधानसभा तो कभी नगरपालिका के चुनाव। लेकिन अफसोस की बात है कि चुनाव अब नेताओं के लिए व्यापार बनते जा रहे हैं और राजनैतिक दलों के चुनावी मैनाफेस्टो व्यापारियों द्वारा अपने व्यापार के प्रोमोशन के लिए बाँटे जाने वाले पैम्पलेट !

और आज इन पैम्पलेट , माफ कीजिए चुनावी मैनिफेस्टो में  लैपटॉप स्मार्ट फोन जैसे इलेक्ट्रौनिक उपकरण  से  लेकर प्रेशर कुकर जैसे बुनियादी आवश्यकता की वस्तु बाँटने से शुरू होने वाली बात घी , गेहूँ और पेट्रोल  तक पंहुँच गई।

 

कब तक हमारे नेता गरीबी की आग को पेट्रोल और घी से बुझाते रहेंगे?
सबसे बड़ी बात यह कि यह मेनिफेस्टो उन पार्टीयों के हैं जो इस समय सत्ता में हैं।
राजनैतिक दलों की निर्लज्जता और इस देश के वोटर की बेबसी दोनों ही दुखदायी हैं। क्यों कोई इन नेताओं से नहीं पूछता कि  इन पांच सालों या फिर स्वतंत्रता के बाद इतने सालों के शासन में तुमने क्या किया?
उप्र की समाजवादी पार्टी हो या पंजाब का भाजपा अकाली दल गठबंधन दोनों को सत्ता में वापस आने के लिए या फिर अन्य पार्टियों को  राज्य के लोगों को आज इस प्रकार के प्रलोभन क्यों देने पड़ रहे हैं?
लेकिन बात जब पंजाब में लोगों को घी बाँटने की हो तो मसला बेहद गंभीर हो जाता है क्योंकि पंजाब का तो नाम सुनते ही जहन में हरे भरे लहलहाते फसलों से भरे खेत उभरने लगते हैं और घरों के आँगन में बँधी गाय भैंसों के साथ खेलते खिलखिलाते बच्चे  दिखने से लगते हैं। फिर वो पंजाब जिसके घर घर में दूध दही की नदियाँ बहती थीं , वो पंजाब जो अपनी मेहमान नवाज़ी के लिए जाना जाता था जो अपने घर आने वाले मेहमान को दूध दही घी से ही पूछता था आज  उस पंजाब के वोटर को उन्हीं चीजों को सरकार द्वारा मुफ्त में देने की स्थिति क्यों और कैसे आ गई?
सवाल तो बहुत हैं पर शायद जवाब किसी के पास भी नहीं।
जब हमारा देश आजाद हुआ था तब भारत पर कोई कर्ज नहीं था तो आज इस देश के हर नागरिक पर औसतन 45000 से ज्यादा का कर्ज क्यों है?
जब अंग्रेज हम पर शासन करते थे तो भारतीय रुपया डालर के बराबर था तो आज वह 68.08 रुपए के स्तर पर कैसे आ गया?
हमारा देश कृषी प्रधान देश है तो स्वतंत्रता के इतने सालों बाद भी आजतक  किसानों को 24 घंटे बिजली एक चुनावी वादा भर क्यों है?
चुनाव दर चुनाव पार्टी दर पार्टी वही वादे क्यों दोहराए जाते हैं?
क्यों आज 70 सालों बाद भी पीने का स्वच्छ पानीगरीबी और बेरोजगारी जैसे बुनियादी जरूरतें ही मैनिफेस्टो का हिस्सा हैं?
हमारा देश इन बुनियादी आवश्यकताओं से आगे क्यों नहीं जा पाया?
और क्यों हमारी पार्टियाँ रोजगार के अवसर पैदा करके हमारे युवाओं को स्वावलंबी बनाने से अधिक मुफ्त चीजों के प्रलोभन देने में विश्वास करती हैं?
यह वाकई में एक गंभीर मसला है कि जो वादे राजनैतिक पार्टियाँ अपने मैनिफेस्टो में करती हैं वे चुनावों में वोटरों को लुभाकर वोट बटोरने तक ही क्यों सीमित रहते हैं।चुनाव जीतने के बाद ये पार्टियाँ अपने मैनिफेस्टो को लागू करने के प्रति कभी भी गंभीर नहीं होती और यदि उनसे उनके मैनिफेस्टो में किए गए वादों के बारे में पूछा जाता है तो सत्ता के नशे में अपने ही वादों को  ‘चुनावी जुमले कह देती हैं।
इस सब में समझने वाली बात यह है कि वे अपने मैनिफेस्टो को नहीं बल्कि अपने वोटर को हल्के में लेती हैं।
आम आदमी तो लाचार है चुने तो चुने किसे आखिर में सभी तो एक से हैं। उसने तो अलग अलग पार्टी   को चुन कर भी देख लिया लेकिन सरकारें भले ही बदल गईं मुद्दे वही रहे।
पार्टी और नेता दोनों  ही लगातार तरक्की करते गए लेकिन वो सालों से वहीं के वहीं खड़ा है। क्योंकि बात सत्ता धारियों द्वारा भ्रष्टाचार तक ही सीमित नहीं है बल्कि सत्ता पर काबिज होने के लिए दिखाए जाने वाले सपनों की है।
मुद्दा वादों  को हकीकत में बदलने का सपना दिखाना नहीं उन्हें सपना ही रहने देना है।
चुनाव आयोग द्वारा चुनाव से पहले आचार संहिता लागू कर दी जाती है। आज जब विभिन्न राजनैतिक दल इस प्रकार की घोषणा करके वोटरों को लुभाने की कोशिश करते हैं तो यह देश और लोकतंत्र दोनों के हित में है कि चुनाव आयोग यह सुनिश्चित करे कि पार्टियाँ अपने चुनावी मेनिफेस्टो को पूरा करें और जो पार्टी सत्ता में आने के बावजूद अपने चुनावी मेनिफेस्टो को पूरा नहीं कर पाए वह अगली बार चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दी जाए।
जब तक इन राजनैतिक दलों की जवाबदेही अपने खुद के मेनीफेस्टो के प्रति तय नहीं की जाएगी हमारे नेता भारतीय राजनीति को किस स्तर तक ले जाएंगे इसकी कल्पना की जा सकती है। इस लिए चुनावी आचार संहिता में आज के परिप्रेक्ष्य में कुछ नए कानून जोड़ना अनिवार्य सा दिख रहा है।
डॉ नीलम महेंद्र

    0

भारत को असली ख़तरा आतंकवादियों से नहीं उनके मददगारों से है i.indiaopines.com/yunhidilse/%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%85%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a5%99%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6/

submitted 6 months ago by in Politics
Start a discussion.
Article Details

भारत को असली ख़तरा आतंकवादियों से नहीं उनके मददगारों से है

 

दीपावली की रात जेल से भागे 8 आतंकवादी जो कि प्रतिबंधित संगठन सिमी से ताल्लुक रखते थे उन्हें मध्यप्रदेश पुलिस  8 घंटे के भीतर मार गिराने के लिए बधाई की पात्र है  । बधाई स्थानीय लोगों को भी जिन्होंने पुलिस की मदद कर के देशभक्ति का परिचय देते हुए किसी बड़ी आतंकवादी घटना रोकने में प्रशासन की मदद की । देश में यह एन्काउन्टर अपने आप में शायद ऐसा पहला आँप्रेशन है जिसमें पुलिस ने फरार होने के आठ घंटों के अन्दर ही सभी आतंकवादियों को मार गिराया हो।
इन सभी का बेहद संगीन आपराधिक रिकॉर्ड रहा है हत्या लूट डकैती से लेकर बम धमाकों तक ऐसा कोई काम नहीं जो इन्होंने न किया हो। इनमें से तीन आतंकी तो इससे पहले 30 सितंबर 1 अक्तूबर 2013 की दरमियानी रात को खंडवा जेल  से भी भाग चुके थे और इन्हें  14 फरवरी 2016 को ओड़िशा के राउरकेला से दोबारा गिरफ्तार किया गया था ।फरारी के दौरान इन आतंकवादियों ने 1 फरवरी 2014 आंध्र प्रदेश के करीमनगर इलाके में बैंक डकैती  , 1 मई 2014 को चैन्नई रेलवे स्टेशन के बेंगलुरु  गुवाहाटी ट्रेन में धमाका  , 10 जुलाई 2014 को पुणे के फरसखाना और विश्रामबाग पुलिस थानों में धमाके  ,6 दिसंबर 2014 को रूड़की में एक रैली में धमाका ऐसी ही अनेकों वारदातों को अंजाम दिया था। ऐसे में  जेल से फरार होने के बाद ये आठों किसी बड़ी आतंकवादी घटना को अंजाम नहीं देते ऐसा कैसे कहा जा सकता है  ? कुल मिलाकर ये खूंखार कैदी  आम कैदी नहीं थे और इस देश के मासूम नागरिकों की जान की कीमत निश्चित ही इन आतंकवादियों की जान से ज्यादा है  इसलिये मध्यप्रदेश पुलिस द्वारा की गई कार्यवाही अत्यंत ही 
सराहनीय है   लेकिन इस सब के बीच  इन आठ आतंकवादियों को जेल से भागने से रोकने के प्रयास में हमारे एक आरक्षक रामेश्वर यादव शहीद हो गए  ।इस एन्काउन्टर पर सवाल उठाने वाले बुद्धिजीवियों से एक प्रश्न है कि जो आतंकवादी खाने की थाली को हथियार बनाकर उससे गला रेत कर एक औन ड्यूटी पुलिस कर्मचारी की हत्या कर सकते हैं  टूथब्रश से डुप्लिकेट चाबी बना सकते हैं और चादरों के सहारे 30 फीट ऊँची दीवार आसानी से फाँद कर भाग सकते हैं उन्हें जीवन दान देकर क्या हम अपने देश और उसकी सुरक्षा के साथ खिलवाड़ नहीं करते  ? 
क्या हम भूल गए हैं कि जिस आतंकी अजहर मसूद को भारत के सुरक्षा बलों ने 1994 में गिरफ्तार किया था उसे 1999 में अपह्रत इंडियन एअर लाइन्स के विमान के यात्रियों के बदले छोड़ दिये जाने की कीमत हम आज तक चुका रहे हैं ?
एक तरफ सीमा पर आज रोज हमारा कोई न कोई सैनिक देश की सुरक्षा की खातिर शहीद हो रहा है दूसरी तरफ आतंकवादी हमारी पुलिस को ललकार रहे हैं  । आतंकवादी हर हाल में आतंकवादी ही होता है उसका मानवता से कोई संबंध नहीं होता। कब तक हम मानवता का खून करने वालों के मानव अधिकारों की बात करते रहेंगे  ? कब तक हम अपने शहीद जवानों की शहादत की इज्जत करने के बजाय उस पर सवाल उठाते रहेंगे  ? देश की सुरक्षा के लिए जो भी खतरा हों उन पर होने वाली कार्यवाही के समर्थन के बजाय उस पर प्रश्न चिन्ह लगाते रहेंगे  ? 
हाँ इस घटना से प्रश्न तो बहुत उठ रहे हैं  , वे उठने भी चाहिए और उनके उत्तर मिलने भी चाहिए 
प्रश्न यह कि प्रदेश की सबसे बड़ी जेल से इतने खतरनाक आपराधी भागने में सफल कैसे हुए ? क्या हमारी सुरक्षा इतनी कमजोर है कि आठ अपराधी इसे आसानी से न सिर्फ भेद देते हैं बल्कि एक पुलिस वाले की हत्या करके बड़ी आसानी से भाग भी जाते हैं  ? संकेत स्पष्ट है अगर वे इन घटनाओं को अंजाम देकर भागने में सफल हुए हैं तो इसमें उनकी बहादुरी नहीं कुटिलता हैं और हमारी कमी सिर्फ़ सुरक्षा में चूक ही नहीं बल्कि प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही भी है। क्यों सी सी टीवी कैमरों के बावजूद उनके जेल से भागने के प्रयास जेल अधिकारियों को नजर नहीं आए ? वे तालों की चाबी बनाने में कामयाब कैसे हुए ? एक साथ 35 चादरें कैसे मिल गईं  ? जब पहले से ही खुफिया एजेंसियों ने इस प्रकार की घटना की आशंका जाहिर करी थी तो उसे सीरियसली क्यों नहीं लिया गया ? 
जेल में कैदियों की क्षमता से अधिक संख्या अव्यवस्था को जन्म देती है जिस कारण जेल के भीतर ही कैदियों का एक दूसरे से संघर्ष या फिर जेल के गार्डों पर हमला कर देने की घटनाएं होती रहती हैं। यह भी सत्य है कि कैदियों को जेल के भीतर ही मोबाइल नशीले पदार्थ व अन्य सुविधाएंजेल अधिकारियों की सहायता के बिना उपलब्ध नहीं हो सकती। लेकिन ये कैदी आम नहीं थे क्योंकि यह सभी एक प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन से ताल्लुक रखते थे और इनमें से तीन इससे पहले भी जेल से फरार हो चुके थे , इस सब के बावजूद इनका फिर जेल से भागने में सफल होना जेल प्रशासन की लापरवाही दर्शाता है जिसे उन्होंने त्वरित कार्यवाही करते हुए आठ घंटे में अपनी भूल सुधार कर काफी हद तक अपनी भूल सुधार ली है।
सरकार ने सुरक्षा में चूक के चलते जेल के चार कर्मचारियों को हटा दिया  है जिनमें जेल अधीक्षक और एडीजी शामिल हैं लेकिन बात यहाँ खत्म नहीं होती।
अभी हाल ही में सपा सासंद मुन्नवर सलीम  का पी ए  फरहद जासूसी करते हुए पकड़ा गया है।
तो त्वरित कार्यवाही तो ठीक है लेकिन इस प्रकार के हमारे बीच के   उन लोगों की असली पहचान और उन पर कार्यवाही अधिक आवश्यक है जो आस्तीनों में छिपे हुए हैं और कुछ पैसों के लालच में देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं ताकि इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
डाँ नीलम महेंद्र 

    18

भारत आतंकवाद के खिलाफ है किसी देश के नहीं drneelammahendra.blogspot.in/2016/09/blog-post_30.html

submitted 7 months ago by in Politics
Start a discussion.
Article Details

भारत आतंकवाद के खिलाफ है किसी देश के नहीं
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ ,
हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है
29
सितंबर रात 12.30 बजे
भारत के स्पेशल कमान्डो फोर्स के जवान  जो कि विश्व का सबसे बेहतरीन फोर्स है  , Ml-17 हेलिकॉप्टरों से  LOC के पार पाक सीमा के भिंबर , हाँट भीतर उतरते हैं 
3
किमी  के दायरे  में घुस कर स्प्रिंग ,केल और लीपा सेक्टरों में सर्जीकल स्ट्राइक करके 8 आतंकवादी शिविरों को नष्ट करते हैं। 
इस हमले में न सिर्फ वहाँ स्थित सभी आतंकवादी शिविर और उसमें रहने वाले आतंकी नष्ट हुोते हैं बल्कि उन्हें बचाने की कोशिश में पाकिस्तान सेना के दो जवानों की भी मौत हो जाती है और 9 जवान घायल हो जाते हैं। 
सभी भारतीय जवान इस ओपरेशन को सफलतापूर्वक अंजाम देकर कुशलतापूर्वक भारतीय सीमा में लौट आते हैं।
भारतीय सेना की ओर से पाक डीजीएनओ को इस बारे में सूचित किया जाता है
पाकिस्तानी सेना का बयान आता है ,  ” भारत की ओर से कोई सर्जीकल स्ट्राइक नहीं हुई है, यह सीमा पार से फाइरिंग थी जो पहले भी होती रही है।
इससे बड़ी सफलता किसी देश के लिए क्या होगी कि वह छाती ठोक कर हमला करके सामने वाले देश को अधिकारिक तौर पर सम्पूर्ण विश्व के सामने स्वीकार कर रहा है कि हाँ हमने तुम्हारेी सीमा में 3 किमी तक घुस कर हमला किया है और अपने काम को अंजाम देने के बाद चुपचाप वापस आ गए हैं ।लेकिन सामने वाला देश हमले से ही इंकार कर रहा हो ! यह पाक के लिए कितनी बड़ी विडम्बना है कि बेचारा जब स्वयं आतंकवादियों द्वारा हमला करता है तो भी इंकार करता है और जब हम बदला लेने के लिए उस पर हमला करते हैं तो भी उसे इंकार करना पड़ता है।
जब पूरा देश चैन की नींद सो रहा था भारतीय फौज ने वो काम कर दिया जिसकी प्रतीक्षा पूरा भारत 18 सितंबर से कर रहा था। यह एक बहुत प्रतीक्षित कदम था जैसा कि हमारी सेना ने पहले ही कहा था कि हमारे सैनिकों के बलिदान का बदला अवश्य लिया जाएगा लेकिन समय, स्थान और तरीका हम तय करेंगे ! और वह उन्होंने किया।
किसी भी देश के लिए इस प्रकार के हमलों का सबसे कठिन पहलू होता है अन्तराष्ट्रीय दबाव, लेकिन भारत ने यहाँ भी बाजी मार ली है।
अपने प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही मोदी जी ने पाकिस्तान की तरफ  दोस्ती का हाथ बढ़ाने के लिए जो कदम उठाए  थे और जिस प्रकार की सहशीलता का परिचय उन्होंने दिया था आज उनकी यही कूटनीति अन्तराष्ट्रीय समुदाय को भारत का साथ देने के लिए विवश कर रही है। यह प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति  , राजनीति और कूटनीति की सफलता ही है कि आज विश्व भारत के साथ है और पाकिस्तान अलग थलग पड़ चुका है।
अमेरिकी अखबार वाॅल स्ट्रीट जर्नल ने लिखा है , “मोदी संयम बरत रहे हैं  , पाक इसे हल्के में न ले। पाक सहयोग नहीं करता है तो अलग थलग पड़ जाएगा। अगर पाकिस्तानी सेना सीमा पार हथियार और आतंकी भेजना जारी रखता है तो भारत के पास कारवाही करने के लिए मजबूत आधार होगा  “
यह मोदी की ही विशेषता है कि उन्होंने पाक को घेरने के लिए केवल सैन्य कार्यवाही का सहारा नहीं लिया बल्कि उसे चारों ओर से घेर लिया है। अन्तरराष्ट्रीय  स्तर पर एक तरफ इसी महीने पाक में होने वाला सार्क सम्मेलन निरस्त होने की कगार पर है चूँकि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा इस सम्मेलन में भाग लेने से इनकार करने के बाद बांग्लादेश अफगानिस्तान  और भूटान ने भी इंकार कर दिया है वहीं दूसरी ओर हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने यूएन में पाक को दो टूक सुनाते हुए उसे सबसे बड़े अन्तराष्ट्रीय मंच पर बेनकाब किया और सम्पूर्ण विश्व को आतंकवाद पर एक साथ होने का आहवान करते हुए पाक को अलग थलग करने का महत्वपूर्ण कार्य किया ।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अमेरिका और ब्रिटेन को भारत के इस कदम की पूर्व जानकारी थी।भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की 28 ता० को अमेरिकी सुरक्षा सलाहकार सुसेन राइस से फोन पर लम्बी बातचीत हुई थी और उन्होंने उरी हमले का विरोध किया था। इससे पहले यू एस सेकरेटरी आफ स्टेट  जान कैरी की भी भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से दो दिन में दो बार बात हुई थी। यह सभी बातें इशारा कर रही हैं कि जो अमेरिका कभी पाकिस्तान का साथ खड़ा था आज वह आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई में कम से कम पाक के साथ तो नहीं है और यूएन के ताजा घटनाक्रम ने पाकिस्तान और आतंकवाद के बीच की धुंधली लकीर भी मिटा दी है।सम्पूर्ण विश्व आज जब आतंकवाद के दंश की जड़ों को तलाशता है, तो चाहे 9/11 हो , चाहे ब्रसेलस हो या फिर अफगानिस्तान सीरिया या इराक ही क्यों न हों , हमलावर लश्कर  , जैश हिजबुल या तालीबान या कोई  भी हों उसके तार कहीं न कहीं पाकिस्तान से जुड़ ही जाते हैं। आखिर विश्व इस बात को भूला नहीं है कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान की धरती पर ही मारा गया था । भारत का मोस्ट वान्टेड अपराधी दाउद को भी पाक में ही पनाह मिली हुई है। आज यह  भारत की उपलब्धि है कि वह विश्व को यह भरोसा दिलाने में कामयाब हुआ है कि इस प्रकार की सैन्य कार्यवाही  किसी देश के खिलाफ न होकर केवल आतंकवाद के खिलाफ है। जो बात आज़ादी के 57 सालों में हम दुनिया को नहीं समझा पाए वह इन 2.5 साल में हमने न सिर्फ समझा दी बल्कि कर के भी  दिखा दी। 
इतना ही नहीं द्विपक्षीय स्तर पर भी भारत ने सिंधु जल संधि पर आक्रमक रख दिखाया है और साथ ही उससे  एम एफ स्टेट अर्थात् व्यापार करने के लिए मोस्ट फेवरेबल स्टेट का दर्जे  पर भी पुनर्विचार करने का मन बना लिया है।
इस प्रकार चारों ओर से घिरे और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भी अकेले पड़ चुके पाक को इससे बेहतरीन जवाब दिया भी नहीं जा सकता था। हम सभी भारत वासियों की ओर से भारतीय सेना को बहुत बहुत बधाई आज एक बार फिर हमारी सेना ने सम्पूर्ण विश्व के सामने भारत का मान बढ़ा दिया है , जैसे हमारा हर सैनिक कह रहा हो,
” 
है  लिए हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर 
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर

 

डॉ नीलम महेंद्र

    0

भगवान तो छोड़िये क्या इंसान भी कहलाने लायक है यह ! drneelammahendra.blogspot.in/2016/09/blog-post_17.html

submitted 7 months ago by in Social
Start a discussion.
Article Details

भगवान तो छोड़िये क्या इंसान भी कहलाने लायक है यह !

 

“एक अच्छा चिकित्सक बीमारी का इलाज करता है , एक महान चिकित्सक बीमार का विलियम ओसलर ।
मध्यप्रदेश का एक शहर ग्वालियर , स्थान जे ए अस्पताल  , एक गर्भवती महिला ज्योति 90%  जली हुई हालत में रात 12 बजे अस्पताल में लाईं गईं  , उनके साथ उनकी माँ और भाई भी जली हुई हालत में थे ।ज्योति और उसकी माँ को बर्न यूनिट में भर्ती कर लिया गया लेकिन उसके भाई सुनील को लगभग दो घंटे तक बाहर ही बैठा कर रखा ।उसके बाद जब सुनील का इलाज शुरू किया गया  तब तक काफी देर हो चुकी थी और उन्होंने दम तोड़ दिया। जब घरवालों ने इस घटना के लिए समय पर इलाज न करने का आरोप डाक्टरों पर लगाया तो यह धरती के भगवान नाराज हो गए और 90% जली हुई गर्भवती ज्योति को बर्न यूनिट से बाहर निकाल दिया और वह इस स्थिति में करीब 5 घंटे खुले मैदान में पड़ रही। जब एक स्थानीय नेता बीच में आए तो इनका इलाज शुरू हुआ। इससे पहले डाक्टरों का कहना था  कि  ‘ तू ज्यादा जल गई है …..जिंदा नहीं बचेगी …..तेरा बच्चा भी पेट में मर गया है….. ( सौजन्य दैनिक भास्कर)
क्या यही वह सपनों का भारत है जिसके लिए भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव हँसते हुए फाँसी पर झूल गए थे  ? क्या इसी प्रकार के भारत का स्वप्न राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी ने देखा था  ? क्या यह भारत विश्व गुरु बन पायेगा  ? 
जिस डाँक्टर को हम ईश्वर का दर्जा देते हैं  , जो डाँक्टर अपनी डिग्री लेने से पूर्व मानवता की सेवा करने की शपथ लेते हैं  , जिनके पास न सिर्फ मरीज अपितु उनके परिजन भी एक विश्वास एक आस लेकर आते हैं उनका इस प्रकार का अमानवीय व्यवहार किस श्रेणी में आता है  ? क्यों आज चिकित्सा क्षेत्र सेवा न होकर व्यवसाय बन गया है  ?
आबादी के हिसाब से दुनिया के दूसरे  बड़े देश भारत में न सिर्फ स्वास्थ्य सेवाएं दयनीय स्थिति में हैं बल्कि जिन हाथों में देश के बीमार आम आदमी का स्वास्थ्य है उनकी स्थिति उससे भी अधिक चिंताजनक है  । यह बात सही है कि कुछ डाँक्टरों के शर्मनाक व्यवहार के कारण सम्पूर्ण डाँक्टरी पेशे को कटघड़े में खड़ा नहीं किया जाना चाहिए किन्तु यह भी सत्य है कि मुट्ठीभर समर्पित डाँक्टरों के पीछे इन अनैतिक आचरण करने वाले डाँक्टरों को छिपाया भी नहीं जा सकता। 
बात अनैतिक एवं अमानवीय आचरण तक सीमित नहीं है । बात यह है कि आज मानवीय संवेदनाओं का किस हद तक ह्रास हो चुका है ! जिस डाँक्टर को मरीज की आखिरी सांस तक उसकी जीवन की जंग जीतने में मरीज का साथ देना चाहिए वही उसे मरने के लिए छोड़ देता है ! उसकी अन्तरात्मा उसे धिक्कारती नहीं है  , किसी कार्यवाही का उसे डर नहीं है  । एक इंसान की जान की कोई कीमत नहीं है ? क्यों आज़ादी के 70 वर्षों बाद भी आज भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का एक मजबूत ढांचा तैयार नहीं हो पाया  ? क्यों आज तक हम एक विकासशील देश हैं  ? क्यों हमारे देश का आम आदमी आज तक मलेरिया और चिकनगुनिया जैसे रोगों से मर रहा है और वो भी देश की राजधानी में  ! जब श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों ने इन पर विजय प्राप्त कर ली है तो भारत क्यों आज तक एक मच्छर के आगे घुटने टेकने पर विवश है  ? 
अगर प्रति हजार लोगों पर अस्पतालों में बेड की उपलब्धता की बात करें तो ब्राजील जैसे विकासशील देश में यह आंकड़ा 2.3 है  , श्रीलंका में 3.6 है  ,चीन में 3.8 है जबकि भारत में यह 0.7 है।सबसे अधिक त्रासदी यह है कि ग्रामीण आबादी को बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं के लिए न्यूनतम 8 कि . मी . की यात्रा करनी पड़ती है।
भारत सकल राष्ट्रीय आय की दृष्टि से विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है लेकिन जब बात स्वास्थ्य सेवाओं की आती है इसका बुनियादी ढांचा कई विकासशील देशों से भी पीछे है।अमेरिका जहाँ अपने सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी ) का 17% स्वास्थ्य पर खर्च करता है वहीं भारत में यह आंकड़ा महज 1% है  ।अगर अन्य विकासशील देशों से तुलना की जाये तो बांग्लादेश  1.6% श्रीलंका  1.8% और नेपाल 1.5% खर्च करता है तो हम स्वयं अपनी चिकित्सा सेवा की गुणवत्ता का अंदाजा लगा सकते हैं। भारत एक ऐसा देश है जिसने अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य का तेजी से निजिकरण किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार प्रति 1000 आबादी पर एक डाक्टर होना चाहिए लेकिन  भारत  इस अनुपात को हासिल करने की दिशा में भी बहुत पीछे है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की ताजा रिपोर्ट के अनुसार सर्जरी  , स्त्री रोग  , और शिशु रोग जैसे चिकित्सा के बुनियादी क्षेत्रों में 50% डाक्टरों की कमी है। शायद इसीलिए केंद्र सरकार ने अगस्त 2015 में यह फैसला लिया था कि वह विदेशों में पढ़ाई करने वाले डाक्टरों को  ‘ नो ओब्लिगेशन टू रिटर्न टू इंडिया अर्थात् एनओआरआई सर्टिफ़िकेट जारी नहीं करेगी जिससे वे हमेशा विदेशों में रह सकते थे।
चिकित्सा और शिक्षा किसी भी देश की बुनियादी जरूरतें हैं और वह हमारे देश में सरकारी अस्पतालों एवं स्कूलों में मुफ्त भी हैं लेकिन दोनों की ही स्थिति दयनीय है। सरकारी अस्पतालों में डाक्टर मिलते नहीं हैं और मिल जांए तो भी ठीक से देखते नहीं हैं अगर आपको स्वयं को ठीक से दिखवाना है तो या तो किसी बड़े आदमी से पहचान निकलवाइए या फिर पैसा खर्च करके प्राइवेट में दिखवाइए । आज आए दिन अस्पतालों में कभी किडनी रैकेट तो कभी खून बेचने का रैकेट या फिर बच्चे चोरी करने का रैकेट अथवा भ्रूण लिंग परीक्षण और फिर कन्या भ्रूण हत्या इस प्रकार के कार्य किए जाते हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार ने कानून नहीं बनाए फिर ऐसी क्या बात है कि न तो उनका पालन होता है और न ही कोई डर है। क्यों सरकारी अस्पतालों की हालत आज ऐसी है कि बीमारी की स्थिति में एक मध्यम वर्गीय परिवार सरकारी अस्पताल में इलाज कराने के बजाय प्राइवेट अस्पताल का महंगा इलाज कराने के लिए मजबूर है । एक आम भारतीय की कमाई का एक मोटा हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च होता है। आजादी के इतने सालों बाद भी हमारी सरकार अपने देश के हर नागरिक के स्वास्थ्य के प्रति असंवेदनशील है। जिस आम आदमी की आधी से भी अधिक कमाई और उसकी पूरी जिंदगी अपनी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करते निकल जाती हो उससे आप क्या अपेक्षा कर सकते हैं। जिन सुविधाओं और सुरक्षा के नाम पर उससे टैक्स वसूला जाता है उसका उपयोग न तो उसके जीवन स्तर को सुधारने के लिए हो रहा हो और न ही देश की उन्नति में , जिस  आम आदमी की इस देश से बुनियादी  अपेक्षाएँ  पूरी न हो रही हों वह आम आदमी इस देश की अपेक्षाएँ कैसे पूरी कर पाएगा?
अगर इस देश और इसके आम आदमी की दशा को सुधारना है तो राष्ट्रीय इन्श्योरेन्स मिशन को लागू करने की दिशा में कड़े और ठोस कदम उठाने होंगे।
डाँ नीलम महेंद्र 

    18

ये कहाँ आ गए हम ? i.indiaopines.com/yunhidilse/%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%86-%e0%a4%97%e0%a4%8f-%e0%a4%b9%e0%a4%ae/

submitted 8 months ago by in Politics
Start a discussion.
Article Details

            ये  कहाँ आ गए हम ?

“फ़रिश्ता बनने की  चाहत न करें तो बेहतर है , इन्सान हैं  इन्सान ही बन जाये यही क्या कम है  !”
तारीख़ :   25 अगस्त 2016 
स्थान   :   ओड़िशा के कालाहांडी जिले का सरकारी अस्पताल 
अमंग देवी  टी बी के इलाज के दौरान जीवन से अपनी जंग हार जाती हैं । चूँकि वे एक आदिवासी, नाम , दाना माँझी की पत्नी हैं  , एक गुमनाम मौत उन्हें गले लगाती है।

 लेकिन हमारी सभ्यता की खोखली तरक्की  , राज्य सरकारों की कागज़ी योजनाओं ,पढ़े लिखे सफेदपोशों से भरे समाज की पोल खोलती  इस देश में मानवता के पतन की कहानी कहती एक तस्वीर ने उस गुमनाम मौत को अखबारों और न्यूज़ चैनलों की सुर्खियाँ बना दिया 
जो जज्बात एक  इंसान की मौत नहीं जगा पाई वो जज्बात एक तस्वीर जगा गई। पूरे देश में हर अखबार में  हर चैनल में  सोशल मीडिया की हर दूसरी पोस्ट में अमंग देवी को अपनी मौत के बाद जगह मिली लेकिन उनके मृत शरीर को एम्बुलेंस में जगह नहीं मिल पाई ।
पैसे न होने के कारण तमाम मिन्नतों के बावजूद जब अस्पताल प्रबंधन ने शव वाहिका उपलब्ध कराने में असमर्थता जताई तो लाचार दाना माँझी ने अपनी पत्नी के मृत शरीर को कन्धे पर लाद कर अपनी 12 वर्ष की रोती हुई बेटी के साथ वहाँ से 60 कि. मी. दूर अपने गाँव मेलघारा तक पैदल ही चलना शुरू कर दिया और करीब 10 कि.मी. तक चलने के बाद कुछ स्थानीय लोगों के हस्तक्षेप से और खबर मीडिया में आ जाने के बाद उन्हें  एक एम्बुलेंस नसीब हुई।
पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर जिला कलेक्टर का कहना था कि माँझी ने वाहन का इंतजार ही नहीं किया। वहीं द टेलीग्राफ का कहना है कि एक नई एम्बुलेंस अस्पताल में ही खड़ी होने के बावजूद सिर्फ इसलिए नहीं दी गई क्योंकि किसी वी आई पी के द्वारा उसका उद्घाटन नहीं हुआ था।इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि ऐसी ही स्थितियों के लिए नवीन पटनायक की सरकार द्वारा फरवरी माह में  ‘महापरायण योजना की शुरुआत की गई थी  । इस योजना के तहत शव को सरकारी अस्पताल से मृतक के घर तक पहुंचाने के लिए मुफ्त में परिवहन सुविधा दी जाती है।बावजूद इसके एक गरीब पति पैसे के अभाव में अपनी पत्नी के शव को 60 कि . मी. तक पैदल ले जाने के लिए मजबूर है 
 
अगर परिस्थिति का विश्लेषण किया जाए तो निष्कर्ष यह निकलेगा कि बात दाना माँझी के पास धन के अभाव की नहीं है बल्कि बात उस अस्पताल प्रबंधन के पास मानवीय संवेदनाओं एवं मूल्यों के अभाव की है  । बात  एक गरीब आदिवासी की नहीं है बात उस तथाकथित सभ्य समाज की है जिसमें एक बेजान एम्बुलेंस को किसी वी आई पी के इंतजार में खड़ा रखना अधिक महत्वपूर्ण लगता है बनिस्पत किसी जरूरतमंद के उपयोग में लाने के।बात उस संस्कृति के ह्रास की है जिस संस्कृति ने भक्त के प्रबल प्रेम के वश में प्रभु को नियम बदलते देखा है, लेकिन उस देश में सरकारी अफसर किसी मनुष्य के कष्ट में भी नियम नहीं बदल पाते । यह कैसा विकास है जिसके बोझ तले इंसानियत मर रही है जो सरकारें अपने आप को गरीबी हटाने और गरीबों के हक के लिए काम करने का दावा करती हैं उन्हीं के शासन में उनके अफसरों द्वारा अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है। 
किसी की  आँख का आंसू 
मेरी आँखों में आ छलके
किसी की साँस थमते देख
मेरा दिल चले   थम  के;
किसी के जख्म की टीसों पे ;
मेरी रूह तड़प जाये;
किसी के पैर के छालों से
मेरी आह निकल जाये;
प्रभु ऐसे  ही भावो से मेरे इस दिल को तुम भर दो;
मैं कतरा हूँ मुझे  इंसानियत का दरिया तुम कर दो.
किसी का खून बहता देख 
मेरा खून जम जाये;
किसी की चीख पर मेरे
कदम उस ओर बढ़ जाये;
किसी को देख कर भूखा
निवाला न निगल पाऊँ;
किसी मजबूर के हाथों की
मैं लाठी ही बन जाऊं;
प्रभु ऐसे ही भावों से मेरे इस दिल को तुम भर दो;
मैं कतरा हूँ मुझे इंसानियत का दरिया तुम कर दो  ( डॉ  शिखा कौशिक)
बात हमारे देश के एक पिछड़े राज्य ओड़िशा के एक आदीवासी जिले की अथवा सरकार या उसके कर्मचारियों की नहीं है बात तो पूरे देश की है हमारे समाज की है हम सभी की है 
16
अगस्त 2016  : भारत की राजधानी दिल्ली 
एक व्यस्त बाजार  , दिन के समय एक युवक सड़क से पैदल जा रहा था और वह अपनी सही लेन में था। पीछे से आने वाले एक लोडिंग औटो की टक्कर से वह युवक गिर जाता है, औटा वाला रुकता है  औटो से बाहर निकल कर अपने औटो को टूट फूट के लिए चेक करके बिना एक बार भी उसकी टक्कर से घायल व्यक्ति को देखे निकल जाता है  । सी सी टीवी फुटेज अत्यंत निराशाजनक है क्योंकि कोई भी व्यक्ति एक पल रुक घायल की मदद करने के बजाय उसे देखकर सीधे आगे निकलते जाते हैं।
कहाँ जा रहे हैं सब ? कहाँ जाना है ? किस दौड़ में  हिस्सा  ले रहे हैं  ? क्या जीतना चाहते हैं सब ? क्यों एक पल ठहरते नहीं हैं  ? क्यों जरा रुक कर एक दूसरे की तरफ प्यार से देखने का समय नहीं है, क्यों एक दूसरे की परवाह नहीं कर पाते  ,क्यों एक दूसरे के दुख दर्द के प्रति संवेदनशील नहीं हो पाते , क्यों दूर से देख कर दर्द महसूस नहीं कर पाते ? क्यों हम इतने कठोर हो गए हैं कि हमें केवल अपनी चोट  ही तकलीफ देती है  ? क्या हम सभी भावनाशून्य मशीनों में तो तब्दील नहीं हो रहे ?

विकास और तरक्की की अंधी दौड़ में हम समय से आगे निकलने की चाह में मानव भी नहीं रह पाए  । बुद्धि का इतना विकास हो गया कि भावनाएं पीछे रह गईं । भावनाएं ही तो मानव को पशु से भिन्न करती हैं  । जिस विकास और तरक्की की दौड़ में मानवता पीछे छूट जाए , भावनाएँ मृतप्राय हो जांए ,मानव पशु समान भावना शून्य हो जाए उस विकास पर हम सभी को आत्ममंथन करने का समय आ गया है 

 

डॉ नीलम महेंद्र 

    33

जम्मू और लद्दाख भारत में खुश हैं तो कश्मीर क्यों नहीं है i.indiaopines.com/yunhidilse/%e0%a4%9c%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%82-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%96-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%96/

submitted 8 months ago by in Politics
Start a discussion.
Article Details

जम्मू और लद्दाख भारत में खुश हैं तो कश्मीर क्यों नहीं है 

घर को ही आग लग गई घर के चिराग से
8
जुलाई 2016 को कश्मीर के एक स्कूल के प्रिंसिपल का बेटा और हिजबुल मुजाहिदीन का दस लाख रुपए का ईनामी आतंकवादी बुरहान वानी की मौत के बाद से आज तक लगातार सुलगता कश्मीर कुछ ऐसा ही आभास कराता है 
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर को मुद्दा बनाने के मकसद से घाटी में पाक द्वारा इस प्रकार की प्रायोजित हिंसा कोई पहली बार नहीं है।
15
अगस्त  1947 में भारत की आज़ादी के महज़ दो महीने के भीतर 22 अक्तूबर  1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला करके अपने इरादे जाहिर कर दिए थे। तब से लेकर आज तक कश्मीर मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच तीन युद्ध हो चुके हैं  1947 , 1965 ,और 1999 में कारगिल। आमने सामने की लड़ाई में हर बार असफल होने पर अब पाक  इस  प्रकार से बार बार पीठ पीछे वार करके   अपने नापाक  इरादों को सफल करने की असफल कोशिशों में लगा है   

 

12 अगस्त 2016 , प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्पष्ट रूप से कहा कि पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भी भारत का अभिन्न अंग है। वह जम्मू कश्मीर के चार हिस्सों  : जम्मू  , कश्मीर घाटी  , लद्दाख और पीओके में शामिल है और बातचीत में इन सभी को शामिल करना होगा  । इससे पहले भारतीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी इसी प्रकार का वक्तव्य दे चुके हैं 
22
अक्तूबर 1947 से इस बात को कहने के लिए इतने साल लग गए  ।पहली बार भारत ने कश्मीर मुद्दे पर दिए जाने वाले अपने बयान में मूलभूत बदलाव किया है  ।भारत सरकार ने पहली बार कश्मीर मुद्दे पर रक्षात्मक होने के बजाये आक्रामक शैली अपनाई है .प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने  कश्मीर मुद्दे पर पाक को स्पष्ट रूप से यह सन्देश दे  दिया है  कि अब बात केवल पाक अधिकृत कश्मीर पर एवं घाटी में पाक द्वारा प्रयोजित हिंसा  पर  ही होगी .साथ ही  बलूचिस्तान एवं पी ओ के में  रहने वाले लोगों की  दयनीय स्थिति एवं वहाँ होने वाले  मानव अधिकारों के हनन के मुद्दे को भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठा कर न सिर्फ भारतीय राजनीति में  बल्कि पाक एवं वैश्विक स्तर पर  भी राजनैतिक परिद्रश्य बदल दिया है .
बीते अक्तूबर में यूनाइटेड नेशनस जनरल एसेम्बली में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से कहा था कि मुद्दा  “पीओके है न कि जम्मू कश्मीर।
कश्मीर  हमारे देश की जन्नत है भारत का ताज है और हमेशा रहेगा लेकिन क्यों  आज तक   हमने कभी अपने ताज के उस हिस्से के बारे में जानने की कोशिश नहीं  करी जो पाकिस्तान के कब्जे में है  ? हमारे अपने ही देश से कश्मीर में मानव अधिकार हनन का मुद्दा कई बार उठा है लेकिन क्या कभी एक बार भी राष्ट्रीय अथवा अन्तराष्ट्रीय स्तर पर पाक अधिकृत कश्मीर में मानव अधिकारों के हनन पर चर्चा हुई है  ? इसे पाक सरकार की कूटनीतिक चातुरता और अब तक की भारतीय सरकारों की असफलता ही कहा जा सकता है कि पाक द्वारा लगातार प्रायोजित आतंकवाद , सीमा पर गोली बारी और घुसपैठ के कारण कश्मीर में होने वाली मासूमों की मौतों के बावजूद अन्तराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर एक मुद्दा है लेकिन पीओके पर किसी का कोई बयान नहीं आता  , उसकी कोई चर्चा नहीं होती    
दरअसल कश्मीर समस्या की जड़ को समझें तो शुरुआत से ही यह एक राजनैतिक समस्या रही है जिसे पंडित नेहरू ने यू एन में ले जाकर एक अन्तराष्ट्रीय समस्या में तब्दील कर दिया था । यह एक राजनैतिक उद्देश्य से प्रायोजित समस्या है जिसका हल राजनीति कूटनीति और दूरदर्शिता से ही निकलेगा।
कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने हाल ही में स्वीकार किया है कि कुल दो प्रतिशत लोग हैं जो कश्मीर की आज़ादी की मांग करते हैं और अस्थिरता फैलाते हैं जबकि वहाँ का आम आदमी 
शांति चाहता है रोजगार चाहता है तरक्की चाहता है और अपने बच्चों के लिए एक सुनहरा भविष्य चाहता है।कहने की आवश्यकता नहीं कि यह दो प्रतिशत लोग वे ही हैं जो पाकिस्तान के छिपे एजेन्डे  को ही आगे बढ़ा रहे हैं । प्रधानमंत्री मोदी ने सही कहा कि जिन हाथों में लैपटॉप होने चाहिए थे उनमें पत्थर थमा दिए अब उन हाथों से पत्थर छुड़ा कर  लैपटॉप थमाने की राह निश्चित ही आसान तो नहीं होगी।
कश्मीर भारत के उत्तरी इलाक़े का वो राज्य है जिसमें जम्मू  , कश्मीर और लद्दाख आता है। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि आज़ादी के बाद से ही जम्मू और लद्दाख भारत में खुश हैं तो कश्मीर क्यों नहीं है  ?
क्यों आज कश्मीर का उल्लेख भारत के एक राज्य के रूप में न होकर समस्या के रूप में होता है।
क्यों आज कश्मीर की  जब हम बात करते हैं तो विषय होते हैं आतंकवाद  , राजनीति  , कश्मीरी पंडित या लाइन आफ कंट्रोल पर होने वाली गोलाबारी ? वहाँ की खूबसूरती , वहाँ का पर्यटन उद्योग क्यों नहीं होता ? हम केवल अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले कश्मीर की बात करते आये हैं वो भी बैकफुट पर  ! लेकिन  क्या हमने कभी पाक अधिकृत कश्मीर की बात करी ? कश्मीर में आतंकवादियों तक के मानव अधिकारों की बातें तो बहुत हुई लेकिन क्या कभी पीओके अथवा तथाकथित आज़ाद कश्मीर में रहने वाले कश्मीरियों  की हालत के बारे में हमने जानने की कोशिश की ? क्या हमने कभी यह जानने की कोशिश की कि  कितना आज़ाद है
आज़ाद कश्मीर ‘ ! हाल ही में ब्रिटिश थिंक टैंक चथम हाउस  ” द्वारा  पीओके में कराए गए एक सर्वेक्षण में यह तथ्य निकल कर आया है कि वहाँ के 98% स्थानीय कश्मीरी पाकिस्तान में विलय नहीं चाहते हैं। 
कश्मीरी नागरिक अरीफ शहीद द्वारा उर्दू में लिखी उनकी पुस्तक  “कौन आज़ाद कौन ग़ुलाम में उन्होंने तथाकथित आज़ाद कश्मीरियों के दर्द को बखूबी प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार भारत में रहने वाले कश्मीरी आर्थिक एवं राजनैतिक रूप से उसी प्रकार आज़ाद हैं जैसे भारत के किसी अन्य राज्य के लोग  । किन्तु पाक अधिकृत कश्मीर में आने वाले गिलगित और बाल्टिस्तान के लोगों की स्थिति बेहद दयनीय है।
जहाँ भारत सरकार आज तक इस बात को सुनिश्चित करती है कि किसी भी दूसरे राज्य का व्यक्ति कश्मीर में रह नहीं सकता  , वहाँ का नागरिक नहीं बन सकता  , वहीं दूसरी ओर पीओके आतंक का अड्डा बन चुका है  । वहाँ पर आतंकवादियों के ट्रेनिंग कैम्प चलते हैं और वह लश्कर ए तैयबा का कार्य स्थल है।इन ट्रेनिंग कैम्पों के कारण वहाँ का स्थानीय नागरिक बहुत परेशान है ।उनमें से कुछ ने तो वहाँ से पलायन कर लिया है और भारत में शरणार्थी बन गए हैं । सबसे दुखद पहलू यह है कि 26/11 के आतंकवादी हमले को अंजाम देने वाला अजमल कसाब की ट्रेनिंग भी यहीं हुई थी 
आज जब पश्चिमी मीडिया और भारतीय मीडिया के कुछ गिने चुने लोगों द्वारा पीओके की सच्चाई दुनिया के सामने आ रही है तो प्रश्न यह उठता है कि अगर अब तक इस मुद्दे की अनदेखी एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा था तो यह भारत के ख़िलाफ एक बहुत ही भयानक साजिश थी लेकिन यदि यह नादानी अथवा अज्ञानता वश हुआ तो यह हमारी अत्यधिक अक्षमता ही कही जाएगी।
पाकिस्तान द्वारा अन्तराष्ट्रीय मंचों पर बार बार कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की मांग उठाई जाती रही है । उसकी इस मांग पर अखबारों एवं टीवी चैनलों पर अनेकों वाद विवाद हुए लेकिन यह भारतीय मीडिया एवं अब तक की सरकारों की अकर्मण्यता ही है कि आज तक  13 अगस्त  1948 के उस यू एन  रेसोल्यूशन का पूरा सच देश के सामने नहीं रखा गया कि किसी भी प्रकार के जनमत संग्रह के बारे में  ‘सोचने से भी पहले पाकिस्तान को कश्मीर के उस हिस्से को खाली करना होगा। 
समस्या कोई भी हो हल निकाला जा सकता है आवश्यकता इच्छाशक्ति की होती है। यह  सर्वविदित है कि कश्मीर मुद्दा पाक नेतृत्व के लिए संजीवनी बूटी का काम करता है  इसी मुद्दे के सहारे वे सरकारें बनाते हैं और इसी के सहारे अपनी नाकामयाबियों से वहाँ की जनता का ध्यान हटाते हैं तो कश्मीर समस्या का हल पाक कभी  चाहेगा नहीं , सबसे पहले इस तथ्य को भारत को समझना चाहिए । अत:  इस समस्या का समाधान तो भारत को ही निकालना होगा।
सबसे पहले भारत सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि पाकिस्तान की रोटियाँ कश्मीर की आग से सिकनी बन्द हों  । कुछ ऐसी कूटनीति करनी होगी कि जिस आग से वह अपना घर आज तक रोशन करता आया है  , वही आग उसका घर जला दे । कश्मीर का राजनैतिक लाभ तो अब तक बहुत उठा लिया गया है अब समय है राजनैतिक हल निकाल कर अपने ताज के टूटे  हुए हिस्से को वापस लाने का  ।

डाँ नीलम महेंद्र 

    0

यहाँ पर गौर करने लायक बात यह है कि यह सभी आतंकवादी पढ़े लिखे हैं और कहने को अच्छे परिवारों से ताल्लुक drneelammahendra.blogspot.in/2016/07/blog-post_17.html

submitted 9 months ago by in Politics
Start a discussion.
Article Details

जुल्म तो हमारी सेना पर हो रहा है 

गर फ़िरदौस बर रुए ज़मीं अस्त,हमीं अस्त,हमीं अस्त,हमीं अस्त ।”  —फारसी में मुगल बादशाह जहाँगीर के शब्द ! 
कहने की आवश्यकता नहीं कि इन शब्दों का उपयोग किसके लिए किया गया है –जी हाँ कश्मीर की ही बात हो रही है  लेकिन धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला यह स्थान आज  सुलग रहा है  प्राचीन काल में हिन्दू और बौद्ध संस्कृतियों के पालन स्थान के चिनार आज जल रहे हैं  वो स्थान  जो सम्पूर्ण विश्व में केसर की खेती के लिए मशहूर था आज बारूद की फसल उगा रहा है। 
हिजबुल आतंकवादी बुरहान वानी की 8 जुलाई 2016 को भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा मार दिए जाने की घटना के बाद से ही घाटी लगातार हिंसा की चपेट में है  
खुफिया सूत्रों के अनुसार अभी भी कश्मीर में 200 आतंकवादी सक्रिय हैं  इनमें से 70% स्थानीय हैं और 30% पाकिस्तानी  बुरहान ने 16 से 17 साल के करीब 100 लोगों को अपने संगठन में शामिल कर लिया था  बुरहान की मौत के बाद हिजबुल मुजाहिदीन ने महमूद गजनवी को अपना नया आतंक फैलाने वाला चेहरा नियुक्त किया है। 
किसी आतंकवादी की मौत पर घाटी में इस तरह के विरोध प्रदर्शन पहली बार नहीं हो रहे। 
1953 में शेख मोहम्मद अब्दुला जो कि यहाँ के प्रधानमंत्री थे , उन्हें जेल में डाला गया था तो कई महीनों तक लोग सड़कों पर थे। 
कश्मीर की आज़ादी के संघर्ष की शुरुआत करने वालों में शामिल जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के संस्थापकों में से एक मकबूल बट को 11 फरवरी 1984 को फाँसी दी गई थी तो कश्मीरी जनता ने काफी विरोध प्रदर्शन किया था। 
1987 में चुनावों के समय भी कश्मीर हिंसा की चपेट में था। 
2013 में भारतीय संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु को जब फाँसी दी गई तब भी कश्मीर  सुलगा था। 
यहाँ पर गौर करने लायक बात यह है कि यह सभी आतंकवादी पढ़े लिखे हैं और कहने को अच्छे परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। यह सभी देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त थे बावजूद इसके इन्हें कश्मीरी जनता का समर्थन प्राप्त था। 
बुरहान एक स्कूल के प्रिन्सिपल का बेटा था । मकबूल कश्मीर यूनिवर्सिटी से बी ए और पेशावर यूनिवर्सिटी से एम ए करने के बाद शिक्षक के तौर पर तथा पत्रकार के तौर पर काम कर चुका था।अफजल गुरु ने एम बी बी एस की पढ़ाई बीच में छोड़ दी थी और भारत में आई ए एस अफसर बनने का सपना देखा करता था। 
पाकिस्तान वानी को शहीद का दर्जा देकर 19 जुलाई को काला दिवस मनाने का एलान कर चुका है। 
जम्मू कश्मीर नेशनल कान्फ्रेंस के लीडर  उमर अब्दुलाह ने ट्वीट किया कि “वानी की मौत उसकी जिंदगी से ज्यादा भारी पड़ सकती है।” 
क्या एक साधारण सी घटना को अनावश्यक तूल नहीं दिया जा रहा? क्या एक देशद्रोही गतिविधियों में लिप्त एक भटके हुए लड़के को स्थानीय नौजवानों का आदर्श बनाने का षड्यंत्र नहीं किया जा रहा  ?क्या यह हमारी कमी नहीं है कि आज देश के बच्चे बच्चे को बुरहान का नाम पता है लेकिन देश की रक्षा के लिए किए गए अनेकों  ओपरेशन  में शहीद हमारे बहादुर सैनिकों के नाम किसी को पता नहीं ?  
हमारे जवान जो दिन रात कश्मीर में हालात सामान्य करने की कोशिश में जुटे हैं उन्हें कोसा जा रहा है और आतंकवादी हीरो बने हुए हैं  ?  
एक अलगाववादी नेता की अपील पर एक आतंकवादी की शवयात्रा में उमड़ी भीड़ हमें दिखाई दे रही है लेकिन हमारे सैन्य बलों की सहनशीलता नहीं दिखाई देती जो एक तरफ तो आतंकवादियों से लोहा ले रहे हैं और दूसरी तरफ अपने ही देश के लोगों के पत्थर खा रहे हैं । 
कहा जा रहा है कि कश्मीर की जनता पर जुल्म होते आए हैं कौन कर रहा है यह जुल्म ? सेना की वर्दी पहन कर ही आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देते हैं तो यह तय कौन करेगा कि जुल्म कौन कर रहा है  ? अभी कुछ दिन पहले ही सेना के जवानों पर एक युवती के बलात्कार का आरोप लगाकर कई दिनों तक सेना के खिलाफ हिंसात्मक प्रदर्शन हुए थे लेकिन बाद में कोर्ट में उस युवती ने स्वयं बयान दिया कि वो लोग सेना के जवान नहीं थे स्थानीय आतंकवादी थे  ।इस घटना को देखा जाए तो जुल्म तो हमारी सेना पर हो रहा है!  
यह संस्कारों और बुद्धि का ही फर्क है कि कश्मीरी नौजवान” जुल्म “के खिलाफ हाथ में किताब छोड़कर बन्दूक उठा लेता है और हमारे जवान हाथों में बन्दूक होने के बावजूद उनकी कुरान की रक्षा करते आए हैं। ? 
कहा जाता है कि कश्मीर का युवक बेरोजगार है तो साहब बेरोजगार युवक तो भारत के हर प्रदेश में हैं क्या सभी ने हाथों में बन्दूकें थाम ली हैं  ? 
क्यों घाटी के नौजवानों का आदर्श आज कुपवाड़ा के डाँ शाह फैजल नहीं हैं जिनके पिता को आतंकवादियों ने मार डाला था और वे 2010 में सिविल इंजीनियरिंग परीक्षा में टाप करने वाले पहले कश्मीरी युवक बने ? उनके आदर्श 2016 में यू पी एस सी में द्वितीय स्थान प्राप्त करने वाले कश्मीरी अतहर आमिर क्यों नहीं बने ? किस षड्यंत्र के तहत आज बुरहान को कश्मीरी युवाओं का आदर्श बनाया जा रहा है  ? 
पैसे और पावर का लालच देकर युवाओं को भटकाया जा रहा है।  
कश्मीर की समस्या आज की नहीं है इसकी जड़ें इतिहास के पन्नों में दफ़न हैं। आप इसका दोष अंग्रेजों को दे सकते हैं जो जाते जाते बँटवारे का नासूर दे गए। नेहरू को दे सकते हैं जो इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले गए।पाकिस्तान को भी दे सकते हैं जो इस सब को प्रायोजित करता है। लेकिन मुद्दा दोष देने से नहीं सुलझेगा ठोस हल निकालने ही होंगे। 
आज कश्मीरी आजादी की बात करते हैं क्या वे अपना अतीत भुला चुके हैं ? राजा हरि सिंह ने भी आजादी ही चुनी थी लेकिन 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने हमला कर दिया था।तब उन्होंने सरदार पटेल से मदद मांगी थी और कश्मीर का विलय भारत में हुआ था। 
कश्मीरी जनता को भारत सरकार की मदद स्वीकार है लेकिन भारत सरकार नहीं  ! प्राकृतिक आपदाओं में मिलने वाली सहायता स्वीकार है भारतीय कानून नहीं  ? केंद्र सरकार के विकास पैकेज मन्जूर हैं केंद्र सरकार नहीं  ?  इलाज के लिए भारतीय डाक्टरों की टीम स्वीकार हैं भारतीय संविधान नहीं ? 
क्यों हमारी सेना के जवान  घाटी में जान लगा देने के बाद भी कोसे  जातें  है  ? क्यों हमारी सरकार आपदाओं में कश्मीरियों की मदद करने के बावजूद उन्हें अपनी सबसे बड़ी दुशमन दिखाई देती है ? अलगाववादी उस घाटी को उन्हीं के बच्चों के खून से रंगने के बावजूद उन्हें अपना शुभचिंतक क्यों दिखाई देते हैं ? 
बात अज्ञानता की है दुषप्रचार की है । 
हमें  कश्मीरी की जनता को जागरूक करना ही होगा। 
अलगाववादियों के दुषप्रचार को रोकना ही होगा। 
कश्मीरी युवकों को अपने  आदर्शों को बदलना ही होगा। 
कश्मीरी जनता को भारत सरकार की मदद स्वीकार करने से पहले भारत की सरकार को स्वीकार करना ही होगा। 
उन्हें सेना की वर्दी पहने  आतंकवादी और एक सैनिक के भेद को समझना ही होगा। 
एक भारतीय सैनिक की इज्जत करना सीखना ही होगा। 
कश्मीरियों को अपने बच्चों के हाथों में कलम चाहिए या बन्दूक यह चुनना ही होगा। 
घाटी में चिनार खिलेंगे या जलेंगे चुनना ही होती। 
झीलें पानी की बहेंगीं या उनके बच्चों के खून की उन्हें चुनना ही होगा। 
यह स्थानीय सरकार की नाकामयाबी कही जा सकती है जो स्थानीय लोगों का विश्वास न स्वयं जीत पा रही है न हिंसा रोक पा रही है। 
चूँकि कश्मीरी जनता के दिल में अविश्वास आज का नहीं है और उसे दूर भी उन्हें के बीच के लोग कर सकते हैं तो यह वहाँ के स्थानीय नेताओं की जिम्मेदारी है कि वे कश्मीरी बच्चों की लाशों पर अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेकनी बन्द करें और कश्मीरी जनता को देश की मुख्यधारा से जोड़ने में सहयोग करें। 
डाँ नीलम महेंद्र  

 

 

    15

क्यों ना भ्रष्टाचार मुक्त भारत का नारा भी लगाते? i.indiaopines.com/yunhidilse/12968/

submitted 10 months ago by in Politics
Start a discussion.
Article Details

क्यों ना भ्रष्टाचार मुक्त भारत का नारा भी लगाते?

टाइम्स नाऊ नमक अंग्रेजी न्यूज़ चैनल को दिए ताज़ा साक्षात्कार में माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी  ने भ्रष्टाचार से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए कहा  ” बहुत सी ऐसी चीजें होती हैं जो दिखाई नहीं देतीं हैं। कोई इस चीज़ को नहीं समझ सकता कि मैं किस तरह की गंदगी का सामना कर रहा हूँ। जो काम कर रहा है उसी को पता है कि कितनी गंदगी है। इसके पीछे कई तरह की ताकतें हैं।
जब देश के प्रधानमंत्री को ऐसा कहना पढ़े तो आम आदमी की व्यथा को तो आराम से समझा ही जा सकता है। ऐसा पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार के विषय में नहीं कहा है इससे पहले हमारे पूर्व स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने भी स्वीकार किया था कि भ्रष्टाचार के कारण एक रुपये में से सिर्फ बीस पैसे ही उसके असली हकदार को मिल पाते हैं।
करप्शन भारत में आरम्भ से ही चर्चा एवं आन्दोलनों का एक प्रमुख विषय रहा है और हाल ही के समय में यह चुनावों का भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन कर उभरा है।
दरअसल समस्या कोई भी हो उसका हल ढूंढा जा सकता है किन्तु सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है जब लोग उसे समस्या मानना बंद कर दें और उसे स्वीकार करने लगें ।हमारे देश की सबसे बड़ी चुनौती आज भ्रष्टाचार न होकर लोगों की यह मानसिकता हो गई है कि वे इस को सिस्टम का हिस्सा माननेलगे हैं।
हालांकि रिश्वतखोरी से निपटने के लिए हमारे यहाँ विशाल नौकरशाही का ढांचा खड़ा है लेकिन सच्चाई यह है कि शायद इसकी जड़ें देश में काफी गहरी पैठ बना चुकी हैं । आचार्य चाणक्य ने कहा था कि जिस प्रकार जल के भीतर रहने वाली मछली जल पीती है या नहीं यह पता लगाना कठिन है उसी प्रकार सरकारी कर्मचारी भ्रष्ट आचरण करते है या नहीं यह पता लगाना एक कठिन कार्य है।
यह अकेले भारत की नहीं अपितु एक विश्व व्यापी समस्या है और चूँ की इसकी उत्पत्ति नैतिक पतन से होती है इसका समाधान भी नैतिक चेतना से ही हो सकता है ।किसी भी प्रकार के अनैतिक आचरण की उत्पत्ति की बात करें तो नैतिकता के अभाव में मनुष्य का आचरण भ्रष्ट होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है ।किसी भी कार्य मे सफलता प्राप्त करने के लिए आचार्य चाणक्य की विश्व प्रसिद्ध नीति   “साम दाम दण्ड भेद  ” स्वयं मनुष्य के इस स्वभाव का उपयोग करने की शिक्षा देती है। चाणक्य जानते थे कि हर व्यक्ति कि कोई न कोई कीमत होती है बस उसे पहचान कर उससे अपने हित साधे जा सकते हैं ।किन्तु अफ़सोस की बात यह है कि उन्होंने इन नीतियों का प्रयोग दुश्मन के विरुद्ध किया था और हम आज अपने ही देश में अपने ही देशवासियों के विरुद्ध कर रहें हैं और अपने स्वार्थों कि पूर्ति करने के लिए समाज में लोभ को बढ़ावा दें रहें हैं ।
हम भारतीयों से अधिक चाणक्य को शायद अंग्रेजों ने पढ़ा और समझा था । उनकी इस नीति का प्रयोग उन्होंनें  भारत पर अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए  बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से किया ।. हमारे राजा महाराजाओं के सत्ता लोभ और छोटे छोटे स्वार्थों को बढ़ावा देकर इसी को अपना सबसे प्रभावशाली हथियार बनाया और  हमें सालों गुलामी की जंजीरों में बान्ध के रखा। जो भ्रष्टाचार आज हमारे देश में अपनी जड़ें फैला चुका है उसकी शुरुआत ब्रिटिश शासन काल में हुई थी और इसे वे हमारे नेताओं को विरासत में देकर गए थे।अंग्रेजों के समय से ही न्यायालय शोषण के अड्डे बन चुके थे शायद इसीलिए गांधी जी ने कहा था कि अदालतें न हों तो हिन्दुस्तान में न्याय गरीबों को मिलने लगे।
आज़ाद भारत में घोटालों की शुरुआत नेहरू युग में सेना के लिए जीप खरीदी के दौरान 1948 से मानी जा सकती है जो की  80 लाख रुपए का था।तब के हाई कमिश्नर श्री वी के मेनन ने २०० जीपोंके पैसे दे कर सिर्फ १५५ जीपें लीं थी । अब इन घोटालों की संख्या बढ़ चुकी है और रकम करोड़ों तक पहुँच गई हैं ।21 दिसंबर 1963 को संसद में डाँ राम मनोहर लोहिया द्वारा दिया गया भाषण आज भी प्रासंगिक है।वे कहते थे कि गरीब तो दो चार पैसे के लिए बेईमान होता है लेकिन बड़े लोग लाखों करोड़ों के लिए बेईमान होते हैं । हमारी योजनाएं नीचे के  99% प्रतिशत लोगों का जीवन स्तर उठाने के लिए नहीं वरन् आधा प्रतिशत लोगों का जीवन स्तर सुधारने के लिए बनती हैं । आज भारत में नौकरशाही से लेकर राजनीति न्यायपालिका मीडिया पुलिस सभी में भ्रष्टाचार व्याप्त है । 2015 में भारत 176 भ्रष्ट देशों की सूची में 76 वें पायदान पर था । 2005 में ट्रान्सपेरेन्सी इन्टरनेशनल नामक संस्था द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि 62% से अधिक भारतवासियों को सरकारी कार्यालयों में अपना काम कराने के लिए रिश्वत या ऊँचे दर्जे का प्रभाव प्रयोग करना पड़ता है . आज का कटु सत्य यह है कि किसी भी शहर के नगर निगम में रिश्वत दिए बगैर मकान बनाने की अनुमति तक नहीं मिलती है। एक जन्म प्रमाण पत्र बनवाना हो अथवा ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना हो कोई लोन पास कराना हो या किसी भी सरकारी विभाग में काम निकलना हो सभी सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार में लिप्त हैं जनता की ऊर्जा भटक रही है नेता और अधिकारी देश के धन को विदेशी बैंकों में भेज रहे हैं।
बिहार का टापर घोटाला और मध्यप्रदेश का व्यापम घोटाला यह बताने के लिए काफी है कि किस प्रकार डिग्रियाँ खरीदी और बेची जा रही हैं। हमारे नेता संघ मुक्त भारत अथवा कांग्रेस मुक्त भारत के नारे तो बहुत लगाते हैं काश सभी एकजुट होकर भ्रष्टाचार मुक्त भारत का नारा भी लगाते। कभी राजनीति से ऊपर उठकर देश के बारे में ईमानदारी से सोचते। क्या कारण है कि आजादी के सत्तर साल बाद आज भी देश की बुनियादी समस्याएं आम आदमी की बुनियादी जरूरतें ही हैं ? रोटी कपड़ा और मकान की लड़ाई तो आम आदमी अपने जीवन काल में हार ही जाता है शिक्षा के अधिकार की क्या बात की जाए !

जिस देश के कूँए कागजों पर खुद जाते हों डिग्रियाँ घर बैठे मिल जाती हों जहाँ चेहरे देखकर कानून का पालन किया जाता हो। जहाँ शक्तिमान की मौत पर गिरफ्तारियां होती हों और पुलिस अफसर की मौत पर केवल जाँच !
जहाँ इशारत जहाँ जैसे आतंकवादियों की मौत पर एन्काउन्टर का केस दर्ज होता हो और हेमन्त करकरे जैसे अफसरों की मौत पर सुबूतों का इंतजार ! जहाँ धरती के भगवान कहे जाने वाले डाक्टर किडनी घोटालों में लिप्त हों और शिक्षक टापर घोटाले में ! ऐसे देश से भ्रष्टाचार ख़त्म करना आसन नहीं होगा । प्रधानमंत्री जी द्वारा अपने वक्तव्य में जाहिर की गयी पीड़ा को महसूस किया जा सकता है ।
जिस देश के युवा के जीवन की नींव भ्रष्टाचार हो उसी के सहारे डिग्री और नौकरी हासिल करता हो उससे अपने पद पर ईमानदार आचरण की अपेक्षा कैसे की जा सकती है ? जो रकम उसने अपने भविष्य को संवारने के लिए इन्वेस्ट करी थी रिश्वत देने में  नौकरी लगते ही सबसे पहले तो उसे बराबर किया जाता है फिर कुछ भविष्य संवारने के लिए सहेजा जाता है रही वर्तमान की बात तो वह तो सरकारी नौकरी में हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा ही चोखा ।
जब तक इस चक्र को तोड़ा नहीं जाएगा आम आदमी इस चक्रव्यूह में अभिमन्यु ही बना रहेगा।

 

जिस दिन देश का युवा अपनी काबिलीयत की दम पर डिग्री और नौकरी दोनों प्राप्त करने लगेगा तो वह अपनी इसी काबिलीयत को देश से भ्रष्टाचार हटाने में लगाएगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग जीती तब जाएगी जब आम आदमी इसका विरोध करे न कि तब जब इसे स्वीकार करे ।
डॉ नीलम महेंद्र

    0

पलायन के साये मे कैसे बढ़ेगा इंडिया ? i.indiaopines.com/yunhidilse/%e0%a4%aa%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%a2%e0%a4%bc%e0%a5%87/

submitted 10 months ago by in Politics
Start a discussion.
Article Details

पलायन के साये मे कैसे बढ़ेगा इंडिया ?

 
विस्थापन अथवा पलायन –एक ऐसी परिस्थिति जिसमें मनुष्य किसी भी कारणवश अपना घर व्यवसाय जमीन आदि छोड़ कर किसी अन्य स्थान पर जाने को मजबूर हो जाता है या फिर कर दिया जाता है।जीवन की सुरक्षा सर्वोपरि बन जाती हैं और अपनी सभी सुख सुविधाओं से युक्त वर्तमान परिस्थितियों को त्याग कर वह किसी ऐसे स्थान की तलाश में भटकने के लिए मजबूर हो जाता है जहाँ वह शांति से जीवन यापन कर सके।

भारत में अब तक होने वाले विस्थापनों की बात करें तो सबसे बड़ा विस्थापन 1947 में भारत और पाकिस्तान के बँटवारे के दौरान हुआ था जिसकी पीड़ा आज भी कुछ दिलों को चीर जाती होगी। इसी प्रकार 1990 में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था -इन 26 सालों में सिर्फ एक ही परिवार वापस जा पाया है। 1992 में असम से पलायन हुआ था जिसकी आँच बैंगलुरु पूना चेन्नई और कोलकाता तक पहुँच गई थी और उत्तर पूर्व के लोगों को अपनी नौकरी व्यापार सब कुछ छोड़ कर पलायन करना पड़ा था। केरल और बंगाल भी इससे अछूते नहीं रहे हैं।

 

योजना आयोग द्वारा प्रस्तुत 11वीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेजों के अनुसार किसी प्रांत से उसी प्रांत में और एक प्रांत से दूसरे प्रांत में पलायन करने वालों की संख्या पिछले एक दशक में नौ करोड़ सत्तर लाख तक जा चुकी है इसमें से 6करोड़ 60 लाख लोगों ने ग्रामीण से ग्रामीण इलाकों में और 3 करोड़ 60 लाख लोगों ने गाँवों से शहरों की ओर पलायन किया है। दरअसल समाज में जब जब मानवीय मूल्यों का ह्रास होता है और अधिकारों का हनन होता है मानव पलायन के लिए विवश होता है। यह अलग बात है कि बेहतर भविष्य की तलाश में हमारे देश में तो छात्रों और प्रतिभाओं का भी पलायन सालों से होता आया है।
आज विस्थापन की आग उत्तर प्रदेश के शामली जिले के कैराना कस्बे तक पहुँच गई है।जो गांव आज तक देश का एक साधारण सा आम कस्बा हुआ करता था और जहाँ के लोग  शांतिपूर्ण तरीके से अपनी जिंदगी जी रहे थे वह कस्बा आज अचानक लाइम लाइट में आ गया है और राजनैतिक दलों एवं मीडिया की नई कर्मभूमी बन चुका है। नेता इसका राजनैतिक उपयोग करने  और मीडिया इसके द्वारा अपनी टी आर पी बढ़ाने के लिए होड़ में लगे हैं।
कैराना सर्वप्रथम 2013 में साम्प्रदायिक हिंसा के कारण चर्चा में आया था और आज पुनः सुर्खियों में है। स्थानीय सांसद हुकुम सिंह ने प्रेस कान्फेन्स कर मीडिया के सामने वर्ष 2014 से पलायन करने वाले 346 परिवारों की सूची जारी की है और कहा है कि  कैराना को कश्मीर बनाने की साजिश की जा रही है। सांसद ने 10 ऐसे लोगों की सूची भी सौंपी जिनकी हत्या रंगदारी न देने पर कर दी गई थी और कहा कि हालात बेहद संवेदनशील हैं। उन्होंने जहानपुरा का उदाहरण प्रस्तुत किया जहाँ पहले 69 हिन्दू परिवार थे किन्तु आज एक भी नहीं है। इस पूरे मामले को प्रशासनिक जाँच में सही पाया गया है।इसके प्रत्युत्तर में कांग्रेस नेता नीम अफजल का कहना है कि ये लोग रोजगार अथवा कारोबार के कारण पलायन कर रहे हैं।वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि कारागार में बन्द गैंगस्टर मुकिमकला के गुण्डों द्वारा लूट और रंगदारी के कारण परिवारों को पलायन को मजबूर होना पड़ा।  इस मामले का संज्ञान लेते हुए मानव अधिकार आयोग ने भी यू पी सरकार को नोटिस जारी कर के एक सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।
उधर भाजपा की नौ सदस्यीय जाँच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पलायन के पीछे संगठित अपराधी गिरोह है जो कि एक समानांतर सरकार की तरह कार्य कर रहा है और लाचार लोगों द्वारा पुलिस में शिकायत करने पर पुलिस भी  “एडजस्ट” करने का सुझाव देकर अपनी कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है।
यह बात तो कांग्रेस भी मान रही थी और भाजपा भी मान रही है कि पलायन हुआ है स्थानीय प्रशासन भी इस तथ्य को स्वीकार कर रहा है तो इन आरोप प्रत्यारोपों और जाँचों के बीच पलायन केवल एक राजनैतिक उद्देश्य प्राप्ती का मुद्दा बनकर न रह जाए।
आम आदमी अपने आस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है और हमारे नेता रोम के सम्राट नीरो की तरह अपनी अपनी बाँसुरी बजाने में व्यस्त हैं। बेहतर होता कि पलायन के मूलभूत कारणों को जानकर उन्हें जड़ से खत्म करने की दिशा में कुछ ठोस कदम उठाए जाते न कि खोखली बयानबाजी! जिस आम आदमी के कीमती वोट की बदौलत आप सत्ता की ताकत एवं सुख को प्राप्त कर जीवन  की  ऊँचाइयाँ हासिल करते हैं वह स्वयं तो आजादी के 70 सालों बाद भी वहीं के वहीं खड़ा है। हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी कहते हैं कि हमारे देश के एक अरब लोग ही हमारी असली ताकत हैं और यदि वे सब एक कदम भी आगे बढ़ाएँगे तो देश आगे बढ़ जाएगा लेकिन साहब ये लोग बढ़ें तो कैसे? कभी स्थानीय नेताओं द्वारा संरक्षित गुण्डे तो कभी प्रशासन,कभी स्थानीय सरकार तो कभी मौसम की मार ये सब उसे बढ़ने नहीं देते। सरकारें टैक्स तो वसूल लेती हैं लेकिन सुरक्षा और सुविधाएं दे नहीं पातीं। चाहे नेता हों या अफसर कोई भी अपनी कुर्सी से उठकर एक कदम आगे बढ़ाकर अपने अपने क्षेत्र का निरीक्षण तक नहीं करता  सारी सरकारी मशीनरी काग़ज़ों पर ही चल रही है एक  फाइल तो दक्षिणा के बिना आगे बढ़ती नहीं। आज का सरकारी कर्मचारी चुनी हुई सरकार से तनख्वाह लेता है काम करने की और समानांतर सरकार चलाने वालों से काम न करने की (हालांकि सभी सरकारी अधिकारी ऐसे नहीं है कुछ ईमानदार भी हैं भले ही वे मुठ्ठी भर हैं लेकिन शायद इन्हीं की बदौलत देश चल रहा है )। अगर  हमारे नेता और हमारे अफसर एक एक कदम भी ईमानदारी से बढ़ाकर देश की सेवा के लिए उठा लें तो हमारा आम आदमी अनेकों कदम आगे चला जाएगा,उसका जीवन स्तर सुधर जाएगा। किन्तु जिस देश का आदमी पलायन कर के कदम पीछे की ओर ले जाने को मजबूर होता हो उस देश का भविष्य तो आप स्वयं ही समझ सकते हैं कहाँ जाएगा।
डाँ नीलम महेंद्र 

    0

” ऊँ ” को धर्म से जोड़ना सम्पूर्ण मानवता के साथ अन्याय drneelammahendra.blogspot.in/2016/05/blog-post_21.html

submitted 11 months ago by in Social
Start a discussion.
Article Details

21 जून को योग दिवस अन्तराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित हो रहा है। 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों के फलस्वरूप 21/6/2015 को योग की महिमा को सम्पूर्ण विश्व में स्वीकार्यता मिली और इस दिन को सभी  देशों द्वारा योग दिवस के रुप में मनाया जाता है।यह पल निश्चित ही भारत के लिए गर्व का पल था।
भारत में आयुष मंत्रालय ने इस बार 21 जून को आयोजित होने वाले योग दिवस के सम्बन्ध में दिशा निर्देश जारी कर दिए हैं जिसमें कहा गया है किऊँ ” शब्द का उच्चारण अनिवार्य है। कुछ धार्मिक  एवं सामाजिक संगठनों से विरोध के स्वर उठने लगे हैं।
भारत देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष देश है। भारतीय संस्कृति एवं उसके आध्यात्म का लोहा सम्पूर्ण विश्व मान चुका है।ऐसी कई बातों का उल्लेख हमारे वेदों एवं पुराणों   में किया गया है जिनके उत्तर आज भी आधुनिक विज्ञान के पास नहीं हैं फिर भी उन विषयों को पाश्चात्य देशों ने  अस्वीकार नहीं किया है वे आज भी उन विषयों पर खोज कर रहे हैं।क्या आपने कभी सोचा है कि भारतीय ॠषियों द्वारा हजारों वर्षों पूर्व कही बातों पर विश्व आज तक खोज में क्यों लगा है? क्योंकि उन बातों का अनुसरण करने से वे लाभान्वित हुए हैं सकारात्मक परिणाम भी मिले हैं किन्तु उस प्रक्रिया से वे आज तक अनजान हैं जिसके कारण इन परिणामों की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि वे उन बातों के मूल तक पहुँचने के लिए आज तक अनुसंधान कर रहे हैं । वे उन्हें मान चुके हैं लेकिन तर्क जानना चाह रहे हैं।वर्ना आज एप्पल के  कुक  और इससे पहले फेसबुक के मार्क जुकरबर्क जैसी हस्तियां क्यों भारत में मन्दिरों के दर्शन करती हैं?
अब कुछ बातें ” ऊँ” शब्द के बारे में —-
अगर इसके वैज्ञानिक पक्ष की बात करें, तो सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही ऊँ शब्द की भी उत्पत्ति हुई थी , तब जब इस धरती पर कोई धर्म नहीं था । यह बात विज्ञान भी सिद्ध कर चुका है कि यह आदि काल से अन्तरिक्ष में उत्पन्न होने वाली ध्वनि है।क्या आप इस अद्भुत सत्य को जानते हैं कि ऊँ शब्द का उच्चारण एक ऐसा व्यक्ति भी कर सकता है जो बोल नहीं सकता अर्थात एक गूँगा व्यक्ति !यह तो सर्वविदित है कि किसी भी  ध्वनि की उत्पत्ति दो वस्तुओं के आपस में टकराने से होती है किन्तु ऊँ शब्द सभी ध्वनियों का मूल है जब हम ऊँ शब्द का उच्चारण करते हैं तो कंठ के मूल से अ ,उ और म शब्दों को बोलते हैं इसमें कहीं पर भी जिव्हा का प्रयोग नहीं  करना पड़ता कंठ के मूल से उत्पन्न होकर मुख से निकलने वाली ध्वनि  जिसके अन्त में एक अनोखा कम्पन उत्पन्न होता है जिसका  प्रभाव हमें शारीरिक मानसिक एवं आध्यात्मिक तीनों रूपों में महसूस होता है।अनेक प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि ऊँ का उच्चारण न सिर्फ हमारे श्वसन तंत्र एवं नाड़ी तंत्र को मजबूती प्रदान करता है अपितु हमारे मन एवं मस्तिष्क को भी सुकून देता है। अत्यधिक क्रोध अथवा अवसाद की स्थिति में इसका जाप इन दोनों ही प्रकार के भावों को नष्ट करके हममें एक नई सकारात्मक शक्ति से  भर देता है। ऊँ शब्द अपार ऊर्जा का स्रोत है   इससे उत्पन्न होने वाला कम्पन हमें सृष्टि में होने वाले अनुकम्पन से तालमेल बैठाने में मदद करता है एवं अनेक मानसिक शक्तियों को जाग्रत करता है ।
अब अगर इसके धार्मिक पक्ष की बात करें तो 
इस शब्द को किसी एक धर्म से जोड़ना सम्पूर्ण मानवता के साथ अन्याय होगा क्योंकि इसका लाभ हर उस व्यक्ति को प्राप्त होता है जो इसका उपयोग करता है अतः  इसको  धर्म की  सीमाओं में बाँधना अत्यंत निराशाजनक है।
ओम् शब्द सभी संस्कृतियों का आधार है और ईश्वरीय शक्ति का प्रतीक भी  क्योंकि इस शब्द का प्रयोग सभी धर्मों में होता है केवल रुप अलग है जैसे — ईसाई और यहूदी धर्म में”आमेन ” के रूप में ,मुस्लिम धर्म में   ” आमीन” के रूप में बुद्ध धर्म में “ओं मणिपद्मे हूँ” के रूप में और सिख धर्म में “एक ओंकार” के रूप में होता है।अंग्रेजी शब्द ओमनी (omni) का अर्थ भी सर्वत्र विराजमान होना होता है। तो हम कह सकते हैं कि ओम्  शब्द     सभी धर्मों में ईश्वरीय शक्ति का द्योतक है और इसका  सम्बन्ध किसी एक मत अथवा सम्प्रदाय से न होकर सम्पूर्ण  मानवता से है । जैसे हवा पानी सूर्य सभी के लिए है किसी विशेष के लिए नहीं वैसे ही ओम् शब्द की स्वीकार्यता किसी एक धर्म में सीमित नहीं है इसकी महत्ता को सभी धर्मों ने न सिर्फ स्वीकार किया है अपितु अलग अलग रूपों में ईश्वरीय शक्ति के संकेत के रूप में प्रयोग भी किया है। संस्कृत के इन शब्दों का अर्थ इतना व्यापक होता है कि इनके अर्थ को सीमित करना केवल अल्पबुद्धि एवं संकीर्ण मानसिकता दर्शाता है मसलन संस्कृत में  “गो” शब्द का अर्थ होता है गतिमान होना , अब इस एक शब्द से अनेकों अर्थ निकलते हैं जैसे –पृथ्वी ,नक्षत्र, आदि हर वो वस्तु जो गतिशील है लेकिन यह इस दैवीय भाषा का अपमान नहीं तो क्या है कि आज गो शब्द का अर्थ गाय तक सीमित हो कर रह गया है।
म” शब्द को ही लें, इस  शब्द से ईश्वर के पालन करने का गुण परिलक्षित होता है,धरती पर यह कार्य माता करती है इसीलिए उसे “माँ ” कहा जाता है और यही शब्द हर धर्म में हर भाषा में माँ के लिए उपयुक्त शब्द का मूल है देखिए –हिन्दी में “माँ” ,उर्दू में “अम्मी” ,अंग्रेजी में “मदर ,मम्मी, माँम “, फारसी में “मादर” ,चीनी भाषा में  “माकुन ” आदि। अर्थात् मातृत्व गुण को परिभाषित करने वाले शब्द का मूल सभी संस्कृतियों में एक ही है ।प्रकृति भी कुछ यूँ है कि सम्पूर्ण विश्व में कहीं भी बालक जब बोलना शुरू करता है तो सबसे पहले “म ” शब्द से ही अपनी भावनाओं को व्यक्त करता है।
इसी प्रकार जीवन पद्धति एवं पूजन पद्धति का मूल हर संस्कृति में एक ही है अर्थात् मंजिल सब की एक है राहें अलग। हिन्दू,सिख ,मुस्लिम,ईसाई सभी उस सर्वशक्तिमान के आगे शीश झुकाते हैं लेकिन उसके तरीके पर वाद विवाद करके एक दूसरे को नीचा दिखाना कहाँ तक उचित है? जिस प्रकार की मुद्रा में बैठे कर नमाज पढ़ी जाती है वह योगशास्त्र में वज्रासन के रूप में वर्णित है। तो  यह कहा जा सकता है कि मानवता को धर्म विशेष में सीमित नहीं किया जा सकता। जो मानवता के लिए कलयाणकारी है उसका अनुसरण करना ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है और केवल धर्म के नाम पर किसी भी बात का तर्कहीन विरोध सबसे निकृष्ट धर्म है।

डाँ नीलम महेंद्र

 

 

 

    0

शिक्षा का भगवा करण नहीं राष्ट्रीयकरण‏ । i.indiaopines.com/yunhidilse/%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%b5%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a3-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%b0%e0%a4%be/

submitted 11 months ago by in Social
Start a discussion.
Article Details

राजस्थान सरकार द्वारा स्कूली पाठ्यक्रम में बदलाव का पूरे देश में राजनैतिकरण हो रहा है। राज नैतिक पार्टियाँ हैं राजनीति तो करेंगी ही लेकिन क्या राजनीति का स्तर इतना गिर चुका है कि देश से ऊपर स्वार्थ हो गए हैं ? आज सही और गलत कुछ नहीं है सब फायदा और नुकसान है! मुद्दे पर बात करने से पहले मुद्दे को समझ लें तो बेहतर होगा। तो जनाब दास्ताँ कुछ यूँ है कि राजस्थान के आने वाले सत्र में कक्षा 1-8 तक के पाठ्यक्रम में कुछ फेरबदल किया गया है मसलन कुछ विदेशी लेखक जैसे -जान कीट्स , थामस हार्डीविलियम ब्लैक,टी एस इलियाँट और एडवर्ड लेअर की रचनाओं को हटाकर -“द ब्रेव लेडी ऑफ राजस्थान, चित्तौड़ और संगीता जैसे भारतीय लेखकों की रचनाओं जैसे स्वामी विवेकानन्द की कविता  “ साँग औफ  फ्री “तथा गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर की विश्व प्रसिद्ध कविता “वेअर  माइन्ड इज़ विडाउट फीअर ” को शामिल किया गया है। पाठ्यक्रम बदलने का उद्देश्य उस आदेश का पालन करना था जिसमें कहा गया था कि देश और राज्य से जुड़ी गर्व वाली रचनाओं को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। 
 
अब कुछ सवाल उन बुद्धिजीवियों से जिन्हें इस पर आपत्ति है –आपको कीट्स और इलियाँट जैसे विदेशी लेखकों के हटाए जाने से कष्ट है आपका तर्क है कि ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में अंग्रेजी लेखकों को पढ़ाना हमारे बच्चों को  बेहतर भविष्य के लिए तैयार करना है, तो फिर इतने सालों इन्हें पढ़ने के बावजूद हमारा देश अन्त राष्ट्रीय मंच पर अपनी ठोस मौजूदगी दर्ज कराने में नाकाम क्यों रहा ? क्यों आजादी के 69 सालों बाद भी हमारी गिनती विकसित देशों में न होकर विकासशील देशों में ही है? क्यों आज तक भारत को यू एन सेक्योरिटी काउंसिल में स्थान नहीं मिल पाया जबकि जापान और चीन जैसे देश वहाँ उपस्थित हैआपको विलियम ब्लैक और थोमस हार्डी जैसे विदेशी लेखकों को हटाए जाने का अफसोस है लेकिन सम्पूर्ण विश्व में भारत का मान बढ़ाने वाले स्वामी विवेकानन्द एवं गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर को शामिल किए जाने का गर्व नहीं है? हमारे बच्चे अगर विदेशी रचनाकारों की रचनाओं को पढ़ने के बजाए  अपने ही देश के महापुरुषों के बारे में पढ़ें ,उन्हें जानें और याद करें यह तो हर भारतीय के लिए हर्ष का विषय होना चाहिए। 
 
आज आप कह रहे हैं कि शिक्षा का भगवा करण हो रहा है,तो कुछ अनुत्तरित प्रश्न आज भी उत्तरों की अपेक्षा कर रहे हैं जैसे –आज तक इतिहास की पुस्तकों में अकबरऔरंगज़ेब, शहाजहाँ, टीपू सुल्तान आदि का महिमा मंडन किया जा रहा था तो क्यों इन पुस्तकों में हरा रंग आवश्यकता से अधिक  नहीं कहा गया? वो अकबर महान कैसे हो सकता था और वो मुग़ल बहादुर कैसे हो सकते थे जिन्होंने हमारे देश पर आक्रमण कर के न सिर्फ लूट पाट की,मन्दिरों को तोड़ा ,महिलाओं का बलात्कार किया,हिन्दू राजाओं की हत्या की ?बल्कि हमारे वो हिन्दू राजा महान क्यों नहीं हुए जिन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा करने में अपने प्राणों की आहुति दे दी! शिवाजी वीर क्यों नहीं हुए महाराणा प्रताप महान क्यों नहीं हुए? क्यों हमारे बच्चों की इतिहास की पुस्तकों में इन जैसे अनको वीर योद्धाओं पर मात्र दो वाक्य हैं और मुग़लों के लिए दो दो पाठ ? दरअसल इतिहास उसी के द्वारा लिखा जाता है जो जीतता है क्योंकि हारने वाला इतिहास लिखने के लिए जीवित नहीं रहता यही इतिहास का इतिहास है और एक कटु सत्य भी! 
 
आज तक शिवाजी महाराज,पृथ्वी राज चौहानमहाराणा प्रताप, विजय नगर साम्राज्य को पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया गया तो देश से कोई आवाज क्यों नहीं उठीशायद पूरे विश्व में भारत ही वो एकमात्र राष्ट्र है जिसमें अंग्रेजों द्वारा लिखा गया उनकी सुविधानुसार तोड़ा मरोड़ा गया इतिहास पढ़ाना स्वीकार्य है किन्तु अपने देश के सही इतिहास जैसे   ,महाराष्ट्र में शिवाजी और राजस्थान में महाराणा प्रताप को पढ़ाना  शिक्षा का भगवाकरण कहलाता है ।यह विकृत मानसिकता के अलावा और क्या हो सकता है कि जिस बदलाव को शिक्षा का राष्ट्रीयकरण कहना चाहिए उसे भगवाकरण कहा जा रहा है। क्या सेक्युलर शब्द की व्याख्या इतनी सीमित है कि अपने ही देश के वीर योद्धाओं की बात करना हिन्दूइज्म या भगवाकरण कहलाता है? कतिपय यह स्वर उसी ओर से आ रहे हैं जहाँ से कुछ समय पहले असहिष्णुता नामक शब्द का उदय हुआ था और अवार्ड वापसी अभियान चलाया गया था। क्या यह बेहतर नहीं होता कि हमारे बच्चे इतिहास में अपने देश के वीर योद्धाओं की वीरता और उनके बलिदानों के बारे में पढ़कर स्वयं भी क्षत्रिय गुणों से  युक्त वीर देशभक्त नौजवान बनकर निकलते ! क्या हमारी बच्चियों को रानी लक्ष्मी बाई ,चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी ,रावत चुण्डावत की रूपवती वीर हाडी रानी और ऐसी अनेकों वीर भारतीय नारियों के बारे में बताकर उनके व्यक्तित्व को और अधिक बलशाली नहीं बनाया जा सकता था? क्या हमारी आज की पीढ़ी को अपने पूर्वजों का सही इतिहास जानने का अधिकार नहीं है? हर देश में अपने इतिहास को एक विषय के रूप में पढ़ाए जाने के पीछे एक ही उद्देश्य होता है कि उसके नागरिकों में अपने  देश के प्रति  गर्व एवं  सम्मान की भावनाओं का बीजारोपण हो सकें ।इतिहास किसी भी राष्ट्र के लिए गर्व का विषय होना चाहिए विवाद का नहीं। हम स्वयं अपना सम्मान नहीं करेंगे तो दुनिया हमारा सम्मान कैसे करेगी? 
 
आज कुछ बुद्धिजीवियों को कष्ट है कि इतिहास की पुस्तकों में नेहरू नहीं और गोलवरकर क्यों तो जनाब आज से पहले जब गांधी और नेहरू के अलावा और कोई नहीं था तो तब यह आपके लिए मुद्दा क्यों नहीं हुआ? क्यों आज तक हम अपने बच्चों को अंग्रेजों द्वारा लिखे इतिहास को पढ़ाने के लिए बाध्य थे इस बात का क्या जवाब है कि भगत सिंह को “इंडियास स्ट्रगल फौर फ्रीडम “नामक पुस्तक में एक क्रांतिकारी आतंकवादी बताया गया है? क्यों हमारे ग्रंथों  “रामायण” और “महाभारत” को मायथोलोजी (पौराणिक कथाएँ) कहा जाता है और बाइबल एवं कुरान को सत्य घटनाएँ? 
 
क्या यह बेहतर नहीं होता कि हम स्वयं एक एैसा इतिहास लिखते जिससे उस भारत का निर्माण होता जिसे पढ़ने के लिए दुनिया बाध्य होती। 
 
डाँ नीलम महेंद्र  

    0

क्या इतना बुरा हूँ में माँ,तो……… drneelammahendra.blogspot.in/2016/05/blog-post_6.html

submitted 12 months ago by in Social
Start a discussion.
Article Details

  क्या इतना बुरा हूँ में माँ,तो………

 

परीक्षाओं एवं प्रतियोगिताओं का समय चल रहा है और हमारे बच्चों द्वारा आत्महत्याएं समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बनी हुई हैं। पूरे देश में हमारे बच्चे परीक्षा दे रहे हैं या दे चुके हैं और इस दौरान बच्चों से ज्यादा मनोवैज्ञानिक दबाव में माता पिता रहते हैं जिसे वह जाने अनजाने  अपने बच्चों के भीतर स्थानांतरित कर देते हैं , यह आज के दौर की सच्चाई है जबकि हम सभी इस तथ्य से वाकिफ हैं कि तनावमुक्त परिस्थितियों का प्रदर्शन तनाव युक्त परिस्थिति से हमेशा बेहतर होता है।अभिभावकों को इस बात का एहसास होना चाहिए कि जिस प्रकार माता पिता दुनिया में सबसे अधिक प्रेम अपने बच्चों से करते हैं उससे कहीं अधिक प्रेम बच्चा अपने माता पिता से करता है,उसे अपनी चोट पर उतना दर्द नहीं होता जितना माता पिता की पीड़ा में होता है।एक नन्हा सा जीव जब इस दुनिया में आता है तो माता पिता ही उसकी दुनिया होते हैं।धीरे धीरे वह बड़ा होता है तो उसकी दुनिया भी बड़ी होने लगती है उसका वह छोटा सा संसार जिसमें माता पिता का एकाधिकार था अब भाई बहनों ,दोस्तों,दादादादी,नाना ,नानी अड़ोसी पड़ोसी ,आपके नौकर चाकर आदि से विस्तृत होने लगता है किन्तु फिर भी माता पिता का स्थान तो नैसर्गिक रूप से सर्वोपरि ही रहता है ।वह बच्चा  शब्दों की भाषा से अनजान होता है न बोल पाता है और न ही समझ पाता है किन्तु फिर भी अपनी माँ से बात कर लेता है और माँ उससे — जी हाँ उस भाषा में जो संसार के हर कोने में हर प्राणी के द्वारा समझी व महसूस की जाती है, “प्रेम की भाषा”
नि:स्वार्थ प्रेम,न कोई अपेक्षा न कोई शिकायत केवल भावनाओं का संगम !बच्चा कभी डर जाए तो पिता के मजबूत हाथों का स्पर्श मात्र उसे हौंसला प्रदान करता है,जरा सी धूप की तपिश भी लगे तो माँ का आँचल उसे ममता की छाँव से भिगो देता है ,घर के किसी कोने में भी छिप जाए उसे मन ही मन पता होता है कि पापा मम्मी उसे ढूंढ ही लेंगे।वह अनेकों बार इस बात को महसूस कर चुका है कि बिन कहे मम्मी उसकी बात सुन लेती हैं और बिना पूछे पापा उसके मन की बात जान लेते हैं और वो भी तो उनके चेहरे को पढ़ कर 
समझ जाता है कि आज पापा मम्मी खुश हैं या नाराज !फिर अचानक ऐसा क्या हो जाता है कि 15-16 वर्ष का होते होते वह कुछ कहना भी चाहता है तो कह नहीं पाता और उसके बिना कहे ही हर बात समझने वाले माता पिता आज उसे समझ नहीं पा रहे? क्या यह माता पिता के रूप में हमारी नाकामी नहीं है? ये कैसा दोराहा आ जाता है जहाँ कभी एक दूसरे के चेहरे की सिलवटों की भाषा समझने वाले आज एक दूसरे को ही नहीं समझ पा रहे !
विद्यालय में प्रवेश लेते ही वह बच्चा जिसकी नादानियों पर हम उसकी बलाएँ लेते थे आज उसकी एक गलती पर उसे डाँटने लगते हैं,जिस बच्चे से हमें कभी कोई शिकायत नहीं होती थी आज उसी से अपेक्षाओं का पहाड़ है!इसका परिणाम –वह बच्चा जिसके ह्रदय में माता पिता को देखते ही सर्वप्रथम प्रेम व लाड के भाव उमड़ते थे आज उन्हें देखते ही उनकी अपेक्षाओं पर अपनी असफलता से उपजे डर और अपराध बोध की अनुभूति होती है। समय के चक्र के साथ भावनाओं का परिवर्तन होने लगता है और प्रेम के ऊपर भय और निराशा की विजय होती है।जैसे कि  वह कह रहा हो
        
तेरा अपना ही अंश हूँ मैं माँ,
         
शायद तेरा गर्व भी हूँ,
        
आज खुद से ही हारा हूँ मैं माँ,
         
अब शायद तेरा दर्द भी हूँ।
      
 तेरी आँखों में मैंने अपने लिए अनेकों सपने देखे थे
      
 पर वो सपने तुझको  नहीं मुझको ही पूरे  करने थे
      
 कोशिश बहुत की माँ कि तेरा हर सपना सच्चा   कर सकूँ 
       
 लेकिन चाहने मात्र से सपने सच्चे नहीं होते ये बात तुझसे मैं कह न सकूँ
       
 इस बार माफ कर दे माँ अगली बार फिर से मैं आऊँगा
        
 फिर तेरी गोद खिलाऊँगा हर  सपना सच्चा कर के दिखलाऊँगा।                                                        
              
हम माता पिता हैं ,हमें अपने बच्चों से प्रेम है और होना भी चाहिए।लेकिन हम भूल जाते हैं कि प्रेम में समर्पण होता है अधिकार नहीं, स्वतंत्रता का एहसास होता है बन्धन का नहीं,जो जैसा होता उसे उसी रूप में स्वीकार करने की भावना होती हैं बदलने की अपेक्षाएं नहीं तो फिर हम अपने बच्चों को क्यों बदलना चाहते हैं जो काम वो नहीं कर सकते या फिर करना नहीं चाहते ,हम उनसे बड़े और समझदार होते हुए भी उनसे वही काम कराने का बचपना क्यों करने लगते हैं जिसकी कीमत भी बाद में हम ही चुकाते हैं !
जिस बच्चे के खिलौने कपड़े बैग बोतल टिफिन जैसी चीजें हम उसकी पसंद से लेते हैं उससे उसी के जीवन,उसके व्यक्तित्व , उसके भविष्य,उसकी खुशी से जुड़ी सबसे अहम बात कि वह अपना जीवन कैसे जीना चाहता है, वह क्या बनना चाहता है, क्या करना चाहता है , यह नहीं पूछते!समाज में स्वयं को ऊँचा दिखाने के लिए पढ़ाई में खराब प्रदर्शन पर हम उसे नीचा दिखाने लगते हैं!
क्या आप जानते हैं हर साल भारत में हमारे बच्चों    द्वारा लगभग एक लाख आत्महत्याएं होती हैं?सम्पूर्ण विश्व की होने वाली आत्महत्याओं में से 10% भारत में होती हैं।15 -20 वर्ष के युवाओं में आत्महत्या के मामलों में 200% तक की वृद्धि हुई है।हम अपनी जिम्मेदारी से मुँह नहीं मोड़ सकते इसमें दोष केवल बच्चों का नहीं है यह माता पिता के रूप में हमारी असफलता की कहानी है।पहले संयुक्त परिवार होते थे माता पिता की डाँट थी तो दादा दादी का दुलार भी था ।जो बच्चे कल तक दादी नानी की कहानियाँ सुनकर परियों के सपने देखते हुए सोते थे , वो आज एकल परिवारों में बाइयों की गोद में माता पिता के इंतजार में रो रो कर सो जाते हैं।तब बच्चों के बेस्ट फ्रेंड उनके दादा दादी होते थे जिनसे वे अपनी हर वो बात शेयर करते थे जो डर के कारण माता पिता को नहीं बता पाते थे,मन भी हल्का हो जाता था और सही मशवरा भी मिल जाता था ।आज अपने बच्चों से हमारी अपेक्षाओं एवं व्यस्तताओं ने दोनों के बीच एक ऐसी अद्रश्य दीवार खड़ी कर दी है जिसके कारण न हम एक दूसरे को पहले जैसे सुन पाते हैं न ही समझ पाते हैं,जो काम घर के बड़े बूढ़े बातों बातों में कर देते थे आज हेल्पलाइन्स और प्रोफेशनल काउन्सलरस करते हैं।                            
अगर बच्चे के मन में भय की भावना के स्थान पर प्रेम की भावना हो, असफल होने पर माता पिता की ओर से शंका नहीं विश्वास हो कि चाहे कुछ भी हो जाए हम तुम्हारे साथ हैं तो कोई भी बालक इस प्रकार के कदम नहीं उठा सकता क्योंकि विजय 
हमेशा प्रेम की होती है अगर किसी परिस्थिति में बच्चे को आत्महत्या करने जैसा ख्याल आ भी जाएगा तो खुद से पहले वह अपने मम्मी पापा की सोचेगा।जब उसके मन को यह विश्वास होगा कि मेरी असफलता तो मेरे माता पिता सह सकते हैं लेकिन मेरा बिछोह नहीं, तो प्रेम की सकारात्मक सोच से हर नकारात्मक सोच की हार होगी और हमारे बच्चे ही नहीं हम भी विजेता बन कर उभरेंगे।
डाँ नीलम महेंद्र 

    0

न्याय में देरी स्वयं अन्याय है —– drneelammahendra.blogspot.in/2016/04/blog-post_29.html

submitted 12 months ago by in Politics
Start a discussion.
Article Details

न्याय में देरी स्वयं अन्याय है —–

8 सितंबर 2006 महाराष्ट्र का नासिक जिला मुम्बई से 290 कि मी दूर  “मालेगाव ” दिन के सवा एक बजे हमीदिया मस्जिद के पास शबे बारात के जुलूस में बम विस्फोट हुए जिसमें 37 लोग मारे गए और 125 घायल हुए।29 सितम्बर 2008 मालेगांव पुनः दहला इस बार 8 लोगों की मृत्यु हुई और 80 घायल हुए।

25 अप्रैल 2016 सेशन जज वी वी पाटिल की अध्यक्षता वाली विशेष मकोका अदालत ने इस मामले में गिरफ्तार सभी नौ मुस्लिम आरोपियों को सुबूतों के आभाव में रिहा कर दिया।शुरू में इस केस की छानबीन महाराष्ट्र की ए टी एस द्वारा की गई जिसे बाद में सी बी आई को सौंपा गया और 2011 में इस केस को एन आई ए के अधीन किया गया और आज कोर्ट का फैसला पूरे देश के सामने है।

2006 के मुकदमे के फैसले के बाद अब सभी को 2008 के मुकदमे में फैसले का इंतजार है।दरअसल पिछली यू पी ए सरकार द्वारा “हिन्दू आतंकवाद” नाम के जिस शब्द का नामकरण किया गया था अब उसकी हकीकत सामने आने लगी है।जिस इशारत जहाँ को तत्कालीन केन्द्रीय ग्रहमंत्री द्वारा एक बेगुनाह नागरिक कहा गया जबकि उन्हें सरकारी दस्तावेजों एवं खुफिया जानकारी के आधार पर पता था कि वह एक आत्मघाती आतंकवादी थी जिसके निशाने पर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा लाल कृष्ण आडवाणी समेत बी जे पी के अन्य बड़े नेता थे फिर भी तत्कालीन यूपीए सरकार ने  मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर एक झूठे एनकाउन्टर द्वारा इशारत की हत्या का आरोप लगाया था । आज यह सच्चाई देश के सामने है।

26/11  को भी आप भूले नहीं होंगे इस हमले में शामिल हफीज़ सैयीद और आई एस आई को भी तत्कालीन सरकार द्वारा क्लीन चिट दे दी गई थी और कहा गया था कि आरोपियों का सम्बन्ध पाक से नहीं हिन्दू संगठनों से है।

याद कीजिए 2007 के समझौता एकस्प्रेस के धमाके जिसमें कर्नल पुरोहित को गिरफ्तार किया गया  तब जबकि यूनाइटेड स्टेटस ने इसमें अरीफ उसमानी नाम के पाकिस्तानी नागरिक एवं लश्कर के हाथ होने की घोषणा कर दी थी आज तक इस मामले में उपर्युक्त नामों में से एक की भी गिरफ्तारी नहीं हुई है।

क्या सभी जानकारियों के बावजूद उपयुक्त कदम नहीं उठाना देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ नहीं है?

विकिलिक्स द्वारा जारी दस्तावेजों में कहा गया है कि जुलाई 2009 में राहुल गाँधी ने यू एस  एमबैसेडर टिमोथी रिओमार से कहा था कि भारत को असली खतरा लश्कर से नहीं संघ से है (शायद वे कांग्रेस कहना चाह रहे थे) ।

आइये  अब  2008 के मालेगांव के आरोपियों की बात करें 10 अक्तूबर  2008 को महाराष्ट्र पुलिस ने साध्वी प्रज्ञा को पूछताछ के लिए बुलाया और आज तक पूरे देश को उनके लिए  न्याय का इंतजार है ।इनकी गिरफ्तारी स्वामी असीमानन्द के बयान के आधार पर की गई थी जिसे वह स्वयं कह चुके हैं कि वह बयान उनसे जबरदस्ती दिलवाया गया था।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि साध्वी प्रज्ञा आज तक बिना किसी FIR और सुबूत के जेल में हैं (इंडिया ओपिनीस के अनुसार) ।  एन आई ए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) के पास साध्वी के खिलाफ पुख्ता  सुबूत नहीं होने के कारण उसने उन्हें रिहा करने का प्रस्ताव दिया है।इतना ही नहीं 15 अप्रैल  2015 को एपेक्स कोर्ट में जस्टिस एफ एम कालीफूला की अध्यक्षता वाली बेंच ने भी फैसला सुनाया था कि साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित के खिलाफ ऐसे सुबूत नहीं हैं जिनमें उनके ऊपर मकोका के तहत मुकदमा चलाया जाए इसलिए उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया जाना चाहिए  लेकिन आज तक कैंसर जैसी बीमारी और शरीर के निचले हिस्से के पक्षाघात के बावजूद वे जेल में हैं।यह जानकारी आपके लिए अत्यंत पीड़ा दायक होगी कि उनका यह पैरेलेसिस पुलिस द्वारा दी गई प्रताड़नाओं का नतीजा है।टाइम्स आफ इंडिया के अनुसार वेद खुशीलाल आयुर्वेदिक कालेज जहाँ उनका इलाज चल रहा है , राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग में साध्वी द्वारा दर्ज शिकायत के बाद उनका बयान दर्ज किया गया जिसमें  उन्होंने अपने ऊपर महाराष्ट्र पुलिस द्वारा किए गए अत्याचारों का खुलासा किया है इसके  बावजूद उन्हें आज तक न्याय की आस है।आज वो मानवाधिकार कार्यकर्ता कहाँ हैं जो इशारत जहाँ के लिए आगे आए थे, कहाँ है महिला आयोग जो महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई लड़ता है?

भारतीय न्याय प्रणाली का आधार यह है कि भले सौ  गुनहगार छूट जाए किसी बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए कोर्ट अपना काम करता है लेकिन जब तक पुलिस द्वारा आरोपी बनाए व्यक्ति पर आरोप साबित नहीं होते उसे इस प्रकार की शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना देना कहाँ तक उचित है? कल अगर साध्वी प्रज्ञा को अदालत दोषमुक्त करार देकर रिहा कर भी दे तो इतने सालों की उनकी पीड़ित आत्मा  को  क्या न्याय मिल पाएगा?अंग्रेजी में एक कहावत है –जस्टिस डीलेड इज जस्टिस डिनाइड अर्थात् न्याय में देरी स्वयं अन्याय है —–

 

डॅा नीलम महेंद्र